सरकार का कहना है कि नई व्यवस्था लागू करने का उद्देश्य जमीन मापी प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित, तेज और पारदर्शी बनाना है। हालांकि, शुल्क बढ़ने से आम भू-धारकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ने की बात भी सामने आ रही है।
शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए अलग-अलग शुल्क तय
नई व्यवस्था के अनुसार शहरी क्षेत्रों में रैयती जमीन की सामान्य मापी के लिए प्रति खेसरा 2000 रुपये शुल्क निर्धारित किया गया है। वहीं, अधिकतम शुल्क सीमा 8000 रुपये रखी गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन मापी के लिए प्रति खेसरा 1000 रुपये शुल्क देना होगा और इसकी अधिकतम सीमा 4000 रुपये तय की गई है।
तत्काल मापी के लिए भी बढ़ा शुल्क
अगर कोई भू-धारक जल्दी मापी करवाना चाहता है तो उसे तत्काल मापी की सुविधा लेनी होगी। इसके लिए भी नई दरें जारी की गई हैं। शहरी क्षेत्र में तत्काल मापी के लिए प्रति खेसरा 4000 रुपये शुल्क निर्धारित किया गया है, जबकि अधिकतम शुल्क 16 हजार रुपये तक होगा। वहीं ग्रामीण इलाकों में तत्काल मापी के लिए प्रति खेसरा 2000 रुपये और अधिकतम 8000 रुपये शुल्क देना होगा।
जमीन विवाद और राजस्व कार्यों में बढ़ेगा खर्च
जमीन की मापी कई जरूरी कामों के लिए करानी पड़ती है। जैसे जमीन विवाद का समाधान, बंटवारा, दाखिल-खारिज और रिकॉर्ड से जुड़ी प्रक्रिया में मापी की जरूरत होती है। ऐसे में शुल्क बढ़ने से उन लोगों को ज्यादा खर्च करना पड़ेगा, जिन्हें अपनी जमीन की मापी करानी है। कई भू-धारकों का मानना है कि शुल्क बढ़ने से आम लोगों की परेशानी बढ़ सकती है।
ऑनलाइन आवेदन और पारदर्शी प्रक्रिया पर जोर
विभाग ने लोगों से अपील की है कि जमीन मापी के लिए तय प्रक्रिया के अनुसार आवेदन करें। नई व्यवस्था के तहत आवेदन और भुगतान की प्रक्रिया को बेहतर बनाने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि लोगों को अनावश्यक परेशानी का सामना न करना पड़े।

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