स्टील्थ है F-35 की सबसे बड़ी खासियत
F-35 को इस तरह डिजाइन किया गया है कि दुश्मन के रडार पर उसकी मौजूदगी को पहचानना कठिन हो। इसके सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और डेटा-लिंक भी विमान को केवल हथियार ले जाने वाले प्लेटफॉर्म के बजाय एक सेंसर और सूचना साझा करने वाले नेटवर्क नोड के रूप में इस्तेमाल करने की क्षमता देते हैं।
S-400 की चुनौती भी कम नहीं
S-400 कई प्रकार के रडार और मिसाइलों से लैस एयर डिफेंस सिस्टम है। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी स्टील्थ विमान को देख लेना और उस पर हथियार चलाने के लिए पर्याप्त सटीक ट्रैक हासिल करना दो अलग बातें हैं। कम-आवृत्ति वाले रडार स्टील्थ विमान की मौजूदगी का संकेत दे सकते हैं, लेकिन सटीक फायर-कंट्रोल समाधान हासिल करना ज्यादा मुश्किल हो सकता है।
मुकाबला सिर्फ एक सिस्टम का नहीं
वास्तविक युद्ध में F-35 और S-400 अकेले काम नहीं करते। एयरबोर्न सेंसर, दूसरे रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, डेटा-लिंक, मिसाइल और जमीन की भौगोलिक स्थिति जैसे कई कारक परिणाम को प्रभावित करते हैं। इसी वजह से विशेषज्ञ किसी वास्तविक टकराव में पहले से यह तय नहीं करते कि F-35 निश्चित रूप से S-400 से बच जाएगा या S-400 निश्चित रूप से F-35 को मार गिराएगा।
भारत के लिए क्यों अहम है यह तुलना?
भारत के पास S-400 सिस्टम मौजूद हैं और F-35 को लेकर समय-समय पर चर्चा होती रही है। विश्लेषकों ने दोनों प्रणालियों के एक ही देश के सुरक्षा ढांचे में संभावित संचालन से जुड़े तकनीकी और सुरक्षा सवाल भी उठाए हैं। इसलिए F-35 बनाम S-400 की चर्चा केवल हथियारों की ताकत तक सीमित नहीं है, बल्कि रडार, स्टील्थ और नेटवर्क आधारित युद्धक क्षमता को समझने का विषय भी है।

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