नौकरी नहीं जाएगी, पद माने जाएंगे स्वतः सृजित
सुप्रीम कोर्ट की डबल बेंच ने अपने फैसले में कहा कि अनुदेशकों की नियुक्ति को केवल संविदात्मक मानकर सरकार जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। कोर्ट ने माना कि इन शिक्षकों को वर्षों तक लगातार सेवाओं में रखा गया, उन्हें अन्यत्र नौकरी करने से रोका गया और शिक्षा व्यवस्था में उनकी भूमिका अहम रही। ऐसे में उनके पदों को स्वतः सृजित पद माना जाएगा और सेवा समाप्ति का तर्क स्वीकार्य नहीं है।
हाईकोर्ट का आदेश बरकरार, अपील खारिज
शीर्ष अदालत ने लखनऊ हाईकोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए राज्य सरकार की अपील पूरी तरह खारिज कर दी। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि अनुदेशकों को 17,000 रुपये मासिक मानदेय दिया जाएगा और उनके अधिकारों में कोई कटौती नहीं होगी।
मानदेय बढ़ाने पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने राज्य सरकार से कड़े सवाल किए। कोर्ट ने कहा कि जब शिक्षा को लेकर “पढ़ेगा इंडिया, तभी बढ़ेगा इंडिया” की बात की जाती है, तो शिक्षकों के मानदेय में वृद्धि से सरकार को परहेज क्यों है। अदालत ने लंबे समय तक मानदेय में संशोधन न किए जाने को अनुचित श्रम व्यवहार करार दिया।
पुनरीक्षण का अधिकार भी किया स्पष्ट
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अनुदेशकों को मानदेय के नियमित पुनरीक्षण का पूरा अधिकार है। यदि किसी कारण से समय-सीमा पर संशोधन संभव न हो, तो कम से कम वार्षिक आधार पर मानदेय पर विचार किया जाना चाहिए। कोर्ट ने 2017-18 से 17,000 रुपये प्रतिमाह को मान्य मानते हुए इसे अगले संशोधन तक लागू रखने का निर्देश दिया।
भुगतान और बकाया पर क्या आदेश
अदालत ने आदेश दिया है कि संशोधित मानदेय का भुगतान 1 अप्रैल 2026 से शुरू किया जाएगा। वहीं, अब तक का पूरा बकाया 4 फरवरी 2026 से छह महीने के भीतर अनिवार्य रूप से चुकाना होगा। यह फैसला न सिर्फ अनुदेशक शिक्षकों के लिए बड़ी राहत है, बल्कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में लंबे समय से कार्यरत अंशकालिक शिक्षकों को सम्मान और सुरक्षा देने की दिशा में भी एक अहम कदम माना जा रहा है।
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