इस तकनीकी सफलता को भारत की मिसाइल क्षमता के लिए गेम चेंजर माना जा रहा है। SFDR तकनीक के जरिए लंबी दूरी की, अत्यधिक तेज और सटीक एयर-टू-एयर मिसाइलें विकसित की जा सकेंगी, जिससे भारत को रणनीतिक बढ़त मिलेगी।
कैसे हुआ परीक्षण
DRDO के अनुसार, सुबह करीब 10:45 बजे किए गए इस फ्लाइट टेस्ट में सभी प्रमुख सब-सिस्टम्स ने अपेक्षा के अनुरूप प्रदर्शन किया। नोजल-लेस बूस्टर, सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट मोटर और फ्यूल फ्लो कंट्रोल सिस्टम ने निर्धारित मैक स्पीड हासिल करने के बाद सफलतापूर्वक काम किया। बंगाल की खाड़ी के तट पर लगे अत्याधुनिक ट्रैकिंग उपकरणों से प्राप्त फ्लाइट डेटा ने इस परीक्षण की सफलता की पुष्टि की। DRDO की कई प्रयोगशालाओं के वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने पूरे परीक्षण की निगरानी की।
रक्षा नेतृत्व ने जताई खुशी
DRDO प्रमुख समीर वी. कामत ने इस सफलता के लिए वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की टीम को बधाई दी। वहीं रक्षा मंत्रालय ने भी सोशल मीडिया के माध्यम से इस उपलब्धि पर संतोष जताया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने SFDR तकनीक के सफल प्रदर्शन को भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम बताया और DRDO व रक्षा उद्योग की सराहना की।
चुनिंदा देशों की श्रेणी में भारत
SFDR तकनीक के सफल परीक्षण के साथ ही भारत अब उन गिने-चुने देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है, जिनके पास सॉलिड फ्यूल डक्टेड रैमजेट तकनीक है। इस सूची में पहले से अमेरिका, रूस, फ्रांस और कुछ यूरोपीय देश शामिल हैं। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह तकनीक मिसाइल युद्ध में वही बदलाव ला सकती है, जैसा बदलाव स्टेल्थ फाइटर जेट्स ने हवाई युद्ध में किया है।
चीन की मिसाइलों को जवाब
SFDR तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे भारत की एयर-टू-एयर मिसाइलों की रफ्तार और रेंज दोनों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। इस तकनीक का इस्तेमाल भविष्य में अस्त्र मार्क-3 जैसी मिसाइलों में किया जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक चीन की लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल PL-17 को काउंटर करने में अहम भूमिका निभाएगी। आने वाले वर्षों में भारत 300 से 400 किलोमीटर रेंज की अत्याधुनिक एयर-टू-एयर मिसाइल विकसित कर सकता है।

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