न्यूज एजेंसी को दिए एक साक्षात्कार में व्यय सचिव ने बताया कि वेतन आयोग के गठन को ज्यादा समय नहीं हुआ है। आयोग के सदस्य अभी प्रक्रियागत ढांचे को मजबूत कर रहे हैं और आवश्यक अधिकारियों को जोड़ रहे हैं। ऐसे में वेतन संशोधन के वित्तीय प्रभावों का आकलन करना फिलहाल संभव नहीं है।
शुरुआती दौर में है आयोग का काम
वुअलनाम ने कहा कि जब तक आयोग वेतन संरचना, कर्मचारियों की मांगों और सरकार की आर्थिक स्थिति का विस्तृत अध्ययन नहीं कर लेता, तब तक बजट में किसी तरह का अनुमान या प्रावधान करना व्यावहारिक नहीं होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आयोग के सुझावों का वास्तविक प्रभाव समय आने पर ही सामने आएगा।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष जनवरी में आठवें वेतन आयोग का गठन किया था। आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए लगभग 18 महीने का समय दिया गया है। संभावना जताई जा रही है कि आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2026 से लागू की जा सकती हैं।
राजकोषीय अनुशासन पर सरकार का जोर
व्यय सचिव ने बजट से जुड़े व्यापक आर्थिक मुद्दों पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि सरकार कर्ज-जीडीपी अनुपात को एक प्रमुख संकेतक के रूप में देख रही है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि राजकोषीय घाटे को नजरअंदाज किया जाएगा। दोनों ही आपस में जुड़े हुए हैं और दोनों पर समान रूप से निगरानी रखी जा रही है।
उन्होंने बताया कि सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक कर्ज-जीडीपी अनुपात को एक प्रतिशत के दायरे में रखते हुए 50 प्रतिशत तक लाना है। इसके साथ ही राजकोषीय घाटे के आंकड़ों पर भी लगातार नजर रखी जाएगी, ताकि वित्तीय संतुलन बना रहे।
कर्मचारियों को करना होगा इंतजार
व्यय सचिव के बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि फिलहाल आठवें वेतन आयोग को लेकर बजट में किसी तरह की घोषणा की उम्मीद करना जल्दबाजी होगी। आयोग की सिफारिशें आने और उनके वित्तीय असर का आकलन होने के बाद ही सरकार इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाएगी। तब तक केंद्रीय कर्मचारियों को वेतन संशोधन के लिए थोड़ा और इंतजार करना पड़ सकता है।

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