आपको बता दें की इस नई रेल लाइन के निर्माण से न केवल ट्रेनों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि यात्रियों को भीड़ और देरी से भी राहत मिलेगी। साथ ही मालगाड़ियों की आवाजाही आसान होने से औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों को भी गति मिलने की उम्मीद है।
चरणों में होगा निर्माण, काम को मिलेगी रफ्तार
परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए रेलवे ने इसे कई छोटे रेलखंडों में विभाजित किया है। इनमें डीडीयू जंक्शन से दानापुर, दानापुर से फतुहा, फतुहा से बख्तियारपुर, बख्तियारपुर से पुनारख, पुनारख से किऊल और किऊल से झाझा तक के खंड शामिल हैं। इस रणनीति से निर्माण कार्य को सुचारु रूप से आगे बढ़ाया जा सकेगा।
पहले चरण में बख्तियारपुर से फतुहा के बीच लगभग 24 किलोमीटर लंबे खंड को मंजूरी मिल चुकी है, जिस पर करीब 931 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इस हिस्से में भूमि अधिग्रहण का कार्य भी शामिल है। इसके अलावा बख्तियारपुर से पुनारख के बीच 30 किलोमीटर रेलखंड के लिए भी बजट स्वीकृत किया गया है और जल्द ही निर्माण प्रक्रिया शुरू होने की संभावना है।
किऊल और झाझा सेक्शन पर खास ध्यान
पुनारख से किऊल तक तीसरी और चौथी लाइन बिछाने के लिए हजारों करोड़ रुपये की योजना को हरी झंडी मिल चुकी है। वहीं किऊल से झाझा के बीच प्रस्तावित रेलखंड अंतिम स्वीकृति के चरण में है। इस पूरे सेक्शन में ट्रैक बढ़ने से लंबी दूरी की ट्रेनों को बिना रुकावट संचालन में मदद मिलेगी।
किऊल स्टेशन पर भी इस परियोजना के तहत बड़े बदलाव किए जाने की तैयारी है। स्टेशन के आधुनिकीकरण से यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिलेंगी और माल परिवहन के लिए अलग व्यवस्था विकसित की जा सकेगी।
ऐतिहासिक रेल लाइन में आधुनिक विस्तार
गौर करने वाली बात यह है कि डीडीयू-पटना-किऊल-झाझा रेल मार्ग का निर्माण आज़ादी से पहले 19वीं सदी में हुआ था। उस समय की जरूरतों के अनुसार बनी यह लाइन अब वर्तमान यातायात दबाव को संभालने में सक्षम नहीं रह गई थी। तीसरी और चौथी लाइन के जुड़ने से यह ऐतिहासिक रेल मार्ग एक बार फिर आधुनिक भारत की जरूरतों के अनुरूप तैयार हो सकेगा।
बिहार को होंगे बहुआयामी फायदे
इस परियोजना के पूरा होने से बिहार के कई जिलों को सीधा लाभ मिलेगा। यात्रा समय कम होगा, ट्रेनों की समयपालन क्षमता सुधरेगी और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। यह रेल परियोजना बिहार के विकास की पटरी को और मजबूत करने वाली साबित हो सकती है।

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