अमेरिका से डील, लेकिन शर्तों की परछाईं
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की घोषणा के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति लगातार यह संकेत दे रहे हैं कि भारत रूसी तेल से दूरी बनाएगा और वैकल्पिक स्रोतों जैसे वेनेजुएला की ओर रुख करेगा। इससे पहले अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने पर भारत पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाया था, जिसे अब इस ट्रेड डील के तहत हटा लिया गया है।
भारत की ओर से आधिकारिक तौर पर यह जरूर कहा गया है कि जिन देशों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हैं, वहां से तेल नहीं खरीदा जाएगा, लेकिन रूस को लेकर कोई स्पष्ट “कट-ऑफ डेट” या ठोस प्रतिबद्धता सामने नहीं आई है। यही असमंजस तेल बाजार और रिफाइनरियों में दिख रहा है।
रूस का जवाब: डिस्काउंट का बड़ा दांव
अमेरिकी दबाव के बीच रूस ने भी चुप रहने के बजाय आर्थिक हथियार चला दिया है। बीते कुछ दिनों में रूसी तेल खासकर यूराल्स ग्रेड पर भारत को दिया जा रहा डिस्काउंट अचानक बढ़ गया है। बाजार विश्लेषण फर्म आर्गस के मुताबिक, भारत को ब्रेंट क्रूड के मुकाबले करीब 11 डॉलर प्रति बैरल तक की छूट मिल रही है, जिसमें शिपिंग और अन्य लागतें भी शामिल हैं।
यह छूट न केवल जनवरी की शुरुआत के मुकाबले ज्यादा है, बल्कि अमेरिकी प्रतिबंधों से पहले के स्तर से भी कई गुना अधिक मानी जा रही है। भुगतान शर्तों के आधार पर यह छूट और भी आकर्षक हो सकती है।
केप्लर की रिपोर्ट क्या इशारा करती है?
डेटा इंटेलिजेंस फर्म केप्लर के अनुसार, भारत के लिए निकट भविष्य में रूसी तेल से पूरी तरह अलग होना व्यावहारिक नहीं दिखता। जनवरी में भारत का रूसी तेल आयात औसतन 1.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन रहा, जबकि चरम पर यह 2 मिलियन बैरल तक पहुंच चुका है।
केप्लर का अनुमान है कि आने वाली तिमाहियों में यह आयात 1.1 से 1.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन के बीच स्थिर रह सकता है। दिलचस्प बात यह है कि रूसी तेल अभी भी वेनेजुएला के तेल से 4–5 डॉलर प्रति बैरल सस्ता पड़ रहा है, जो किसी भी रिफाइनर के लिए नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

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