भारत-रूस व्यापार को बढ़ावा: दोस्ती होगी और भी मजबूत!

नई दिल्ली। भारत और रूस के पारंपरिक रिश्ते अब एक नए समुद्री रास्ते के ज़रिये और मजबूत होने की दिशा में बढ़ रहे हैं। चेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री कॉरिडोर केवल एक लॉजिस्टिक्स प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि यह भारत-रूस व्यापारिक साझेदारी को नई रणनीतिक ऊंचाई देने वाला कदम माना जा रहा है।

क्यों खास है यह नया समुद्री रूट?

अब तक भारत और रूस के बीच समुद्री व्यापार लंबे और जटिल रास्तों पर निर्भर रहा है, जिसमें 40 दिन या उससे भी अधिक समय लग जाता था। चेन्नई–व्लादिवोस्तोक कॉरिडोर इस दूरी को न केवल भौगोलिक रूप से, बल्कि समय के लिहाज़ से भी छोटा कर देता है। अनुमान है कि इस रूट के चालू होने से डिलीवरी टाइम घटकर लगभग 24 दिन रह जाएगा।

रणनीतिक नजरिए से कितना अहम?

चेन्नई में रूस के कॉन्सल-जनरल वैलेरी खोदज़ायेव के अनुसार यह कॉरिडोर रणनीतिक दृष्टि से बेहद जरूरी है। इसका मकसद सिर्फ व्यापार बढ़ाना नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच लॉन्ग-टर्म कनेक्टिविटी बनाना है। यह परियोजना तुरंत पूरी नहीं होगी, लेकिन इसे जमीन पर उतारना दोनों देशों की साझा जिम्मेदारी है। यह कॉरिडोर भविष्य में आर्कटिक रूट, नॉर्थ-ईस्ट एशिया, और इंडो-पैसिफिक ट्रेड नेटवर्क से भारत को जोड़ने का भी जरिया बन सकता है।

किन सेक्टर्स को मिलेगा सबसे ज्यादा फायदा?

इस समुद्री कॉरिडोर से कई सेक्टर्स को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है। जिसमे फार्मास्यूटिकल्स और हेल्थकेयर, एग्रीकल्चर और फूड प्रोसेसिंग, एनर्जी और कच्चा माल, शिपबिल्डिंग और हैवी इंजीनियरिंग, एयरक्राफ्ट और इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरिंग, इसके साथ-साथ लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए भी यह एक नया और स्थिर बिजनेस मॉडल तैयार कर सकता है।

पोर्ट-टू-पोर्ट कॉरिडोर की सफलता का फॉर्मूला

कोई भी पोर्ट-टू-पोर्ट कॉरिडोर तभी सफल होता है जब दोनों सिरों पर पर्याप्त कार्गो उपलब्ध हो, रेगुलर शिपिंग शेड्यूल तय हों, लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स मौजूद हों, और रिटर्न कार्गो की स्पष्ट योजना हो। चेन्नई–व्लादिवोस्तोक रूट में ये सभी शर्तें पूरी होती नजर आ रही हैं, जो इसे कमर्शियली टिकाऊ बना सकती हैं।

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