इस खुलासे के पीछे नाम है रूस की प्रतिष्ठित रक्षा कंपनी NPO Mashinostroyeniya के CEO और मुख्य डिजाइनर अलेक्जेंडर लियोनोव का। एक अंतरराष्ट्रीय कॉस्मोनॉटिक्स और रक्षा तकनीक सम्मेलन के दौरान अलेक्जेंडर लियोनोव ने सार्वजनिक रूप से बताया कि भारत और रूस सिर्फ मौजूदा ब्रह्मोस मिसाइल को अपग्रेड ही नहीं कर रहे, बल्कि उससे आगे बढ़कर हाइपरसोनिक तकनीक पर भी मिलकर काम कर रहे हैं।
हाइपरसोनिक तकनीक क्यों है गेम-चेंजर
हाइपरसोनिक मिसाइलें आमतौर पर मैच 5 या उससे अधिक की गति से उड़ान भरती हैं। इतनी तेज़ रफ्तार और मैनूवर करने की क्षमता के कारण इन्हें मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम से रोकना बेहद मुश्किल होता है। भारत-रूस का यह साझा प्रयास भविष्य के युद्धों में डिटरेंस यानी रोकथाम की रणनीति को और मजबूत कर सकता है।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम
ब्रह्मोस परियोजना की एक खास बात यह है कि इसमें अब 70 प्रतिशत से अधिक कलपुर्जे भारत में ही बनाए जा रहे हैं। यह केवल “मेक इन इंडिया” नहीं, बल्कि वास्तविक आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की मिसाल है। तकनीकी ट्रांसफर, भारतीय वैज्ञानिकों की भागीदारी और घरेलू इंडस्ट्री को मिलने वाला अनुभव, ये सभी भारत को लंबी अवधि में एक रक्षा निर्यातक देश के रूप में स्थापित कर रहे हैं।
चीन-पाकिस्तान के लिए क्यों बढ़ी चिंता
भारत-रूस की यह साझेदारी उन देशों के लिए स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय है, जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में बनाए रखना चाहते हैं। हाइपरसोनिक तकनीक में भारत की प्रगति, खासकर तब जब वह मल्टी-डोमेन लॉन्च क्षमता के साथ आए, पड़ोसी देशों की सैन्य योजना पर दबाव बढ़ा सकती है। यह सीधे युद्ध की नहीं, बल्कि रणनीतिक संतुलन की बात है।

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