DRDO के अध्यक्ष समीर वी. कामत के अनुसार, इस हाइपरसोनिक मिसाइल के अब तक दो सफल विकास परीक्षण किए जा चुके हैं और तीसरे परीक्षण की तैयारी चल रही है। इन परीक्षणों के पूरा होते ही मिसाइल को यूज़र इवैल्यूएशन ट्रायल के लिए सशस्त्र बलों को सौंपा जाएगा। इसके बाद इसे औपचारिक रूप से भारतीय रक्षा सेवाओं में शामिल किया जाएगा।
ब्रह्मोस से भी आगे की क्षमता
इस नई हाइपरसोनिक मिसाइल की सबसे बड़ी खासियत इसकी अत्यधिक गति और जबरदस्त फायर पावर है। DRDO प्रमुख के मुताबिक, यह मिसाइल मौजूदा ब्रह्मोस प्रणाली से कहीं ज्यादा तेज़ होगी और इसकी मारक क्षमता भी कहीं अधिक होगी। हाइपरसोनिक स्पीड के कारण इसे ट्रैक करना और इंटरसेप्ट करना दुश्मन के लिए बेहद मुश्किल होगा, जिससे यह सिस्टम भारत के लिए एक “गेम-चेंजर” साबित हो सकता है।
फिलहाल इस परियोजना का मुख्य फोकस एंटी-शिप वर्जन पर है, जो दुश्मन के युद्धपोतों और समुद्री प्लेटफॉर्म्स को निशाना बनाने में सक्षम होगा। इसके साथ ही, इसी तकनीक पर आधारित ज़मीनी हमले वाले वर्जन पर भी काम चल रहा है, हालांकि वह अभी शुरुआती चरण में है।
बजट से मिला बड़ा समर्थन
रक्षा क्षेत्र में हो रहे इन बड़े तकनीकी प्रयासों को केंद्रीय बजट 2026 से भी मजबूत समर्थन मिला है। समीर वी. कामत ने बताया कि स्वदेशी रक्षा प्रणालियों के लिए कैपिटल एक्सपेंडिचर को बढ़ाकर 1.39 लाख करोड़ रुपये किया गया है, जबकि कुल रक्षा कैपिटल बजट 2.19 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच गया है।
यह बढ़ोतरी देश के भीतर ही उन्नत सिस्टम के विकास के लिए बेहद सकारात्मक संकेत है। खास तौर पर DRDO के लिए कैपिटल बजट में 15.6% की वृद्धि की गई है, जिससे नई तकनीकों और स्वदेशी हथियार प्रणालियों के अनुसंधान व विकास को रफ्तार मिलेगी।
आत्मनिर्भर भारत की ओर एक और कदम
हाइपरसोनिक मिसाइल परियोजना और बढ़ा हुआ रक्षा बजट यह साफ दिखाता है कि भारत अब सिर्फ आयात पर निर्भर रहने के बजाय, खुद अत्याधुनिक सैन्य तकनीक विकसित करने की राह पर मजबूती से चल पड़ा है। आने वाले समय में ये प्रयास न केवल भारत की सैन्य शक्ति को नई ऊंचाई देंगे, बल्कि देश को वैश्विक रक्षा तकनीक के अग्रणी देशों की कतार में भी खड़ा कर सकते हैं।

0 comments:
Post a Comment