रूस में गहराया बड़ा संकट, समाधान की उम्मीद भारत से!

नई दिल्ली। रूस इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर श्रम संकटों में से एक का सामना कर रहा है। कामकाजी आबादी में लगातार गिरावट, यूक्रेन युद्ध का प्रभाव और तेजी से बूढ़ी होती जनसंख्या ने रूसी अर्थव्यवस्था पर गहरा दबाव बना दिया है। हालात ऐसे हैं कि आने वाले दशक के अंत तक रूस को लगभग 1.1 करोड़ अतिरिक्त श्रमिकों की जरूरत होगी। इस संकट से निपटने के लिए अब रूस की नजरें भारत जैसे अधिक आबादी वाले देशों पर टिकी हैं।

जनसांख्यिकीय गिरावट ने बढ़ाई मुश्किल

रूस पिछले कई दशकों से जन्म दर में गिरावट की समस्या से जूझ रहा है। वर्तमान में देश की लगभग एक-चौथाई आबादी सेवानिवृत्ति की आयु के करीब है। दूसरी ओर, बेरोजगारी दर करीब 2 प्रतिशत है, जो वैश्विक स्तर पर बेहद कम मानी जाती है। इसका सीधा अर्थ है कि देश के भीतर काम करने वाले हाथों की भारी कमी है। यदि इस कमी को समय रहते पूरा नहीं किया गया, तो रूस की पहले से धीमी आर्थिक वृद्धि पर और भी गंभीर असर पड़ सकता है।

युद्ध ने श्रम संकट को और गहरा किया

यूक्रेन के साथ जारी युद्ध ने इस स्थिति को और अधिक जटिल बना दिया है। बड़ी संख्या में युवाओं को सैन्य सेवाओं में लगाया गया, जबकि युद्ध से जुड़ी औद्योगिक जरूरतों ने नागरिक क्षेत्रों से भी श्रमिकों को खींच लिया। इसके अलावा, लाखों कामकाजी उम्र के लोग युद्ध और अनिवार्य भर्ती से बचने के लिए देश छोड़ चुके हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे रूस के श्रम बाजार में एक स्थायी असंतुलन पैदा हो गया है।

अब रूस की भारत से बढ़ती उम्मीदें

इसी पृष्ठभूमि में रूस अब सेंट्रल एशिया के बाहर भारत, बांग्लादेश, श्रीलंका और चीन जैसे देशों से श्रमिकों को आमंत्रित कर रहा है। खासकर भारत के साथ इस दिशा में सहयोग तेजी से बढ़ा है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की नई दिल्ली यात्रा के दौरान अस्थायी श्रम प्रवासन को आसान बनाने से जुड़ा एक समझौता भी हुआ, जिसके बाद भारतीय श्रमिकों को मिलने वाले वर्क परमिट में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।

रूसी शहरों में दिख रहा है बदलाव

आज रूस के बड़े शहरों में भारतीय और दक्षिण एशियाई श्रमिक नगरपालिकाओं के काम, निर्माण स्थलों, रेस्तरां और अन्य सेवाओं में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। भर्ती एजेंसियों का कहना है कि रूसी श्रम बाजार में एक बुनियादी बदलाव हो रहा है, जहां अब दूरस्थ देशों से आए श्रमिक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

उद्योगों पर सीधा असर

श्रमिकों की कमी का असर रूस के बड़े उद्योगों पर भी साफ दिखाई दे रहा है। खनन, जहाज निर्माण और निर्माण जैसे क्षेत्रों में हजारों पद खाली हैं। कई कंपनियां अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही हैं, जिससे उत्पादन और आपूर्ति दोनों प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में विदेश से श्रमिकों को लाना अब केवल विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी बनता जा रहा है।

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