रक्षा अधिकारियों के अनुसार, कुल पांच स्क्वाड्रन में से चौथा सिस्टम जून 2026 तक और अंतिम सिस्टम नवंबर 2026 तक भारत पहुंच जाएगा। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण सप्लाई चेन में आई बाधाओं से पहले देरी हुई थी, लेकिन अब शेड्यूल स्पष्ट कर दिया गया है।
क्यों खास है S-400?
S-400 को दुनिया की सबसे उन्नत लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणालियों में गिना जाता है। यह 400 किलोमीटर तक की दूरी पर लड़ाकू विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइल जैसे लक्ष्यों को ट्रैक और नष्ट करने में सक्षम है। इसकी खासियत है कि यह एक साथ कई लक्ष्यों पर नजर रख सकता है और जरूरत पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय कर सकता है।
भारत की सुरक्षा में क्या बदलेगा?
पांचों सिस्टम पूरी तरह तैनात होने के बाद भारत की बहु-स्तरीय (लेयर्ड) एयर डिफेंस संरचना काफी मजबूत हो जाएगी। S-400 को स्वदेशी Akash missile system और MRSAM जैसी प्रणालियों के साथ जोड़कर एक समेकित सुरक्षा कवच तैयार किया जा रहा है। इससे उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर संभावित हवाई खतरों का सामना करना अधिक प्रभावी होगा। एक साथ कई दिशाओं से होने वाले हमलों के खिलाफ जवाबी क्षमता बेहतर होगी।
क्या हैं इसके रणनीतिक संदेश?
यह डिलीवरी केवल सैन्य सुदृढ़ीकरण नहीं, बल्कि एक स्पष्ट रणनीतिक संकेत भी है। अमेरिका के CAATSA कानून के संभावित दबावों के बावजूद भारत ने इस सौदे को आगे बढ़ाया। इससे यह संदेश जाता है कि भारत अपनी रक्षा आवश्यकताओं को प्राथमिकता देता है और स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम है।
इसे लेकर क्या है आगे की तैयारी?
रूस के साथ मेंटेनेंस, रिपेयर और ओवरहॉल (MRO) सुविधाओं के सहयोग पर भी काम किया जा रहा है, जिन्हें 2028 तक भारत में स्थापित किया जा सकता है। इससे सिस्टम के दीर्घकालिक रखरखाव में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी। साथ ही भारत स्वदेशी ‘प्रोजेक्ट कुशा’ पर भी काम कर रहा है, जिससे भारत के आसमान पूरी तरह से सेफ होंगे।
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