रूस का दोटूक संदेश: भारत जारी रखेगा तेल खरीद, ट्रंप को झटका!

नई दिल्ली। रूस ने साफ कर दिया है कि भारत के साथ उसका ऊर्जा सहयोग किसी तीसरे देश के दबाव में रुकने वाला नहीं है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीद कम करने या रोकने पर सहमति जताई है। लावरोव के मुताबिक, दोनों देशों के बीच हुए ऊर्जा समझौते स्थिर हैं और तय शर्तों के अनुसार जारी रहेंगे।

यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका की ओर से भारत के साथ एक संभावित व्यापार ढांचे (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) की चर्चा की गई थी। उसी दौरान ट्रंप ने संकेत दिया था कि रूस से तेल आयात को लेकर भारत रुख बदल सकता है। हालांकि मॉस्को की ओर से आई प्रतिक्रिया ने इन अटकलों पर विराम लगा दिया है।

ऊर्जा सहयोग क्यों है अहम?

भारत दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातकों में शामिल है और अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है। रूस, रियायती दरों और दीर्घकालिक अनुबंधों के कारण, हाल के वर्षों में भारत के प्रमुख आपूर्तिकर्ताओं में उभरा है। ऐसे में अचानक तेल आयात रोकना न तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा के हित में होगा और न ही उसकी अर्थव्यवस्था के लिए व्यावहारिक कदम माना जाएगा। रूस का यह भी कहना है कि ऊर्जा व्यापार पूरी तरह द्विपक्षीय निर्णय है, जिसमें किसी तीसरे देश की दखलंदाजी स्वीकार्य नहीं हो सकती।

अमेरिका का दबाव और वैश्विक राजनीति

अमेरिका लंबे समय से रूस की ऊर्जा आय पर अंकुश लगाने की कोशिश करता रहा है, खासकर पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद। वॉशिंगटन का मानना है कि रूस की तेल बिक्री से होने वाली कमाई उसके लिए आर्थिक सहारा है। इसी वजह से अमेरिका तेल खरीदने वाले देशों को वैकल्पिक स्रोत अपनाने के लिए प्रेरित करता रहा है। लेकिन भारत ने अब तक संतुलित विदेश नीति अपनाई है। उसने एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक और व्यापारिक रिश्ते मजबूत किए हैं, तो दूसरी ओर रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा सहयोग भी बनाए रखा है।

भारत की रणनीति: राष्ट्रीय हित सर्वोपरि

जानकार बताते हैं कि भारत का प्राथमिक लक्ष्य अपनी ऊर्जा जरूरतों को किफायती और स्थिर स्रोतों से पूरा करना है। यदि रूस प्रतिस्पर्धी कीमतों पर आपूर्ति देता है, तो भारत के लिए यह व्यावहारिक विकल्प बना रहेगा। रूस के हालिया बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा तेल समझौते जारी रहेंगे और ऊर्जा सहयोग में कोई तात्कालिक बदलाव नहीं होगा। इससे यह भी संकेत मिलता है कि वैश्विक दबावों के बावजूद भारत अपनी ऊर्जा नीति राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करता रहेगा।

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