हाई कोर्ट में सरकार का पक्ष
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ, जिसमें जस्टिस राजन राय और जस्टिस ए. के. चौधरी शामिल थे, के समक्ष राज्य सरकार ने बताया कि OBC आयोग के गठन की प्रक्रिया जारी है। सरकार के इस बयान के बाद अदालत ने संबंधित जनहित याचिका को निस्तारित कर दिया।
दरअसल, एक जनहित याचिका में कहा गया था कि प्रदेश के OBC आयोग का कार्यकाल लगभग पांच महीने पहले समाप्त हो चुका है और नए आयोग के गठन के बिना पंचायत चुनाव कराना उचित नहीं होगा। याचिकाकर्ता ने अदालत से सरकार को आयोग का गठन करने का निर्देश देने की मांग की थी।
अदालत का रुख
सरकारी अधिवक्ता ने अदालत को अवगत कराया कि सरकार आवश्यक प्रक्रिया शुरू कर चुकी है। इस आश्वासन के बाद पीठ ने माना कि याचिका में अब कोई शेष विवाद नहीं बचता, इसलिए उसे समाप्त किया जाता है। अदालत का यह निर्णय पंचायत चुनाव की तैयारियों के लिए रास्ता साफ करने वाला माना जा रहा है।
क्यों अहम है OBC आयोग?
पंचायत चुनावों में आरक्षण व्यवस्था संवेदनशील और कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण विषय है। OBC आयोग का गठन इस बात को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी माना जाता है कि आरक्षण का निर्धारण संवैधानिक और न्यायिक मानकों के अनुरूप हो। पिछले कुछ वर्षों में स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण को लेकर कई कानूनी चुनौतियां सामने आई थीं, जिसके चलते आयोग की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है।
क्या है राजनीतिक मायने?
पंचायत चुनाव को ग्रामीण राजनीति की आधारशिला माना जाता है। ऐसे में OBC आयोग का गठन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी अहम कदम है। यह फैसला प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण तय कर सकता है, खासकर तब जब चुनावी तैयारियां रफ्तार पकड़ रही हों।

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