प्रतिबंध और डी-डॉलराइजेशन
दरअसल, 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद रूस पर पश्चिमी देशों के कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगे। इन प्रतिबंधों का बड़ा हिस्सा डॉलर-आधारित वैश्विक वित्तीय तंत्र के माध्यम से लागू हुआ। इसके बाद रूस ने चीन और भारत जैसे देशों के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर जोर दिया। राष्ट्रपति पुतिन के नेतृत्व में मॉस्को ने डॉलर पर निर्भरता घटाने को रणनीतिक लक्ष्य बनाया था। ऐसे में डॉलर प्रणाली में वापसी का विचार नीति में बड़े यू-टर्न के रूप में देखा जा रहा है।
संभावित बदलाव के संकेत
रिपोर्टों के अनुसार, क्रेमलिन के एक आंतरिक दस्तावेज में अमेरिका के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी की रूपरेखा तैयार की गई है। यह पहल कथित तौर पर यूक्रेन युद्ध में संभावित शांति समझौते के संदर्भ में सामने आई है। यदि रूस अमेरिकी डॉलर में निपटान फिर से शुरू करता है, तो वह प्रभावी रूप से वॉशिंगटन की वित्तीय प्रणाली के दायरे में लौट आएगा। यह कदम न केवल आर्थिक, बल्कि रणनीतिक महत्व भी रखता है।
अमेरिका और चीन के लिए क्या मायने?
अमेरिका के लिए यह कदम डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को मजबूत कर सकता है। यदि रूस फिर से डॉलर प्रणाली में लौटता है, तो यह संकेत होगा कि अमेरिकी वित्तीय ढांचा अब भी वैश्विक व्यापार का केंद्रीय स्तंभ बना हुआ है। दूसरी ओर, चीन के लिए यह असहज स्थिति हो सकती है। डी-डॉलराइजेशन की मुहिम में बीजिंग प्रमुख हितधारक रहा है।
यदि मॉस्को वॉशिंगटन के करीब आता है, तो चीन-रूस समीकरण में नई जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि रूस के लिए चीन से पूरी तरह दूरी बनाना आसान नहीं होगा, क्योंकि प्रतिबंधों के बाद से चीन औद्योगिक और तकनीकी आपूर्ति का बड़ा स्रोत बन चुका है।
भारत की संतुलित नीति
भारत ने हमेशा व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाया है। उसने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की वकालत की, लेकिन अमेरिकी डॉलर को पूरी तरह खारिज करने की नीति नहीं अपनाई। ब्रिक्स की साझा मुद्रा जैसे प्रस्तावों से भी भारत ने दूरी बनाए रखी। इस लिहाज से रूस का संभावित रुख भारत की संतुलित आर्थिक कूटनीति के करीब दिखाई देता है।
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