अमेरिका और यूरोप के सौदे: भारत के लिए नई राह
अमेरिका और यूरोप ने मिलकर भारत के निर्यातकों के लिए नए अवसर खोले हैं। अमेरिका के साथ द्विपक्षीय समझौते के तहत भारतीय उत्पादों पर पहले 25 फीसदी लगे टैरिफ को घटाकर 18 फीसदी कर दिया गया है। इसके अलावा, रूसी कच्चे तेल की खरीद को लेकर अमेरिका ने लगाई गई अतिरिक्त सीमाओं को भी हटा दिया है।
वहीं, यूरोपीय संघ के साथ किए गए सौदे को साल के अंत तक लागू होने की उम्मीद है। इन कदमों से विभिन्न क्षेत्रों में ऑर्डर बढ़ने की संभावना है और भारतीय निर्यातकों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा में मजबूती मिलेगी। इससे भारत की ग्रोथ में जबरदस्त वृद्धि का अनुमान हैं।
कौन से सेक्टर सबसे अधिक लाभान्वित होंगे
फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट ऑर्गनाइजेशन (FIEO) के मुताबिक रसायन, जूते और समुद्री उत्पाद जैसे सेक्टरों में ऑर्डर बढ़ने लगे हैं। उनके अनुसार अगले 10-15 दिनों में और अधिक ऑर्डर आने की उम्मीद है। इससे इन क्षेत्रों में उत्पादन और रोजगार दोनों को बढ़ावा मिलेगा।
चीन के मुकाबले चुनौती
हालांकि, भारत के लिए चीन को पीछे छोड़ना आसान नहीं है। चीन का वैश्विक निर्यात 3.77 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है और उसका बाजार हिस्सेदारी भारत के मुकाबले बहुत बड़ी है। वर्तमान में अमेरिका में भारत का हिस्सा केवल 3 प्रतिशत है, जबकि चीन का 35 प्रतिशत है। लेकिन फिर भी अमेरिका और चीन में बढ़ता तनाव भारत के लिए बड़ा मौका बन सकता हैं।
भविष्य की संभावनाएँ
रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी और यूरोपीय बाजार में चमड़े और जूते के निर्यात में पहले साल 30 प्रतिशत और उसके बाद 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। निर्यातकों ने हालांकि सरकार से स्पष्ट कार्यान्वयन समय-सीमा और तेल खरीद से संबंधित नियमों में स्पष्टता की मांग की है, ताकि नई नीतियों का पूरा लाभ उठाया जा सके।
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