क्यों जरूरी हुआ बदलाव?
पिछले एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। जीएसटी लागू होने, कोविड-19 महामारी और डिजिटल लेन-देन में तेज वृद्धि ने आर्थिक गतिविधियों के स्वरूप को बदल दिया है। पुराने आधार वर्ष पर आधारित गणना इन परिवर्तनों को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं कर पा रही थी।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की राष्ट्रीय आय गणना प्रणाली पर सवाल उठे थे। IMF ने 2025 में भारत की सांख्यिकीय कार्यप्रणाली को ‘C’ रेटिंग दी थी, जिससे डेटा प्रणाली को और मजबूत बनाने की आवश्यकता स्पष्ट हुई। अब सरकार ने हर पांच वर्ष में आधार वर्ष को अद्यतन करने का लक्ष्य रखा है, ताकि अर्थव्यवस्था की संरचना में आए बदलाव समय पर शामिल किए जा सकें।
नई प्रणाली में क्या होगा अलग?
नई जीडीपी श्रृंखला में आधुनिक और व्यापक डेटा स्रोतों का उपयोग किया जाएगा। इसमें घरेलू खपत सर्वेक्षण, श्रम बल सर्वेक्षण और जीएसटी जैसे प्रशासनिक आंकड़ों को शामिल किया जाएगा। इससे असंगठित क्षेत्र और गिग इकॉनमी से जुड़े श्रमिकों का योगदान अधिक स्पष्ट रूप से सामने आएगा।
डिजिटल सेवाओं, रिन्यूएबल एनर्जी और नए निवेश क्षेत्रों की बढ़ती भूमिका को भी बेहतर तरीके से मापा जाएगा। हाल ही में खुदरा महंगाई (CPI) का आधार वर्ष 2024 किया गया है, उसी तर्ज पर जीडीपी के आंकड़े भी अद्यतन किए जा रहे हैं।
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में ‘डबल डिफ्लेशन’
विनिर्माण क्षेत्र के आकलन में ‘डबल डिफ्लेशन’ तकनीक अपनाई जाएगी। इस पद्धति में कच्चे माल और तैयार उत्पाद की कीमतों को अलग-अलग समायोजित किया जाता है, जिससे वास्तविक वृद्धि का अधिक सटीक अनुमान मिलता है। पुराने मॉडल में कीमतों के उतार-चढ़ाव से उत्पादन वृद्धि की तस्वीर धुंधली हो जाती थी, जिसे अब दूर करने की कोशिश की गई है। इसके अतिरिक्त, तिमाही और वार्षिक आंकड़ों के बीच संतुलन बनाने के लिए ‘प्रोपोर्शनल डेंटन’ पद्धति लागू की जाएगी, जिससे डेटा में निरंतरता और विश्वसनीयता बढ़ेगी।
आम नागरिक और नीतियों पर प्रभाव
नई गणना पद्धति के बाद भारत की विकास दर पहले से अधिक तेज दिखाई दे सकती है, क्योंकि सेवा क्षेत्र का भार बढ़ेगा और यह क्षेत्र कृषि की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ता है। नई जीडीपी श्रृंखला के आधार पर अर्थव्यवस्था के आकार और पिछली तिमाहियों के आंकड़ों का पुनर्मूल्यांकन होगा। ये आंकड़े मौद्रिक नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ब्याज दरों, ऋण नीतियों और महंगाई नियंत्रण के फैसले इन्हीं पर निर्भर करेंगे।

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