आधार वर्ष बदलना क्यों जरूरी है?
अर्थव्यवस्था समय के साथ बदलती रहती है नई तकनीकें आती हैं, उपभोग के पैटर्न बदलते हैं और नए क्षेत्र उभरते हैं। ऐसे में पुराना आधार वर्ष वास्तविक आर्थिक गतिविधियों को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं कर पाता। इसलिए समय-समय पर राष्ट्रीय लेखा प्रणाली को अद्यतन किया जाता है। राष्ट्रीय आय के आंकड़े जारी करने की जिम्मेदारी सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की है।
नई श्रृंखला में क्या होंगे प्रमुख बदलाव?
1. असंगठित क्षेत्र का बेहतर आकलन
नई जीडीपी श्रृंखला में असंगठित क्षेत्र के अधिक सटीक अनुमान के लिए वार्षिक असंगठित क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण और आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (PLFS) के आंकड़ों का उपयोग किया जाएगा। इससे छोटे व्यवसायों और घरेलू इकाइयों की आर्थिक गतिविधियों का बेहतर आकलन संभव होगा।
2. ई-वाहन और डिजिटल डेटा का उपयोग
सड़क परिवहन सेवाओं से जुड़े निजी अंतिम उपभोग व्यय (PFCE) का अनुमान लगाने के लिए ई-वाहन पोर्टल के डेटा को शामिल किया जाएगा। डिजिटल स्रोतों से प्राप्त आंकड़े आर्थिक गतिविधियों की वास्तविक तस्वीर पेश करेंगे।
3. घरेलू कामगारों का योगदान शामिल
नई प्रणाली में रसोइया, चालक, घरेलू सहायकों जैसे घरेलू कामगारों द्वारा दी जाने वाली सेवाओं को भी जीडीपी में शामिल किया जाएगा। इससे घरेलू सेवा क्षेत्र के वास्तविक योगदान को मान्यता मिलेगी।
अपस्फीति पद्धति में क्या होगा बदलाव
अब तक कुछ क्षेत्रों में “एकल अपस्फीति” पद्धति अपनाई जाती थी, जिसमें मूल्य परिवर्तन को हटाने के लिए एक ही सूचकांक का उपयोग होता था। नई श्रृंखला में इसे समाप्त कर विनिर्माण और कृषि जैसे क्षेत्रों में “दोहरी अपस्फीति” पद्धति लागू की जाएगी।
इस बदलाव से क्या-क्या होगा असर?
अर्थव्यवस्था के आकार और विकास दर का आकलन अधिक यथार्थपरक होगा।
असंगठित और सेवा क्षेत्रों की वास्तविक हिस्सेदारी सामने आएगी।
नीतिगत निर्णय लेने में सरकार को बेहतर और अद्यतन डेटा मिलेगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की आर्थिक रिपोर्टिंग अधिक विश्वसनीय बनेगी।
नई जीडीपी श्रृंखला केवल आंकड़ों में बदलाव नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती अर्थव्यवस्था को मापने की एक आधुनिक और व्यापक पहल है। इससे आर्थिक नीतियों की दिशा तय करने में अधिक पारदर्शिता और सटीकता आएगी।

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