भारत की तरक्की से चीन ही नहीं, अमेरिका को भी जलन!

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीति के तहत भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग में शीर्ष स्थान दिलाने की कोशिशें विदेशों को चुभने लगी हैं। हाल ही में अमेरिका और चीन ने भारत के घरेलू उत्पादन प्रोत्साहन कार्यक्रमों पर आपत्ति जताई है, लेकिन विशेषज्ञ इसे डबल स्टैंडर्ड की माया मान रहे हैं।

उत्पादन प्रोत्साहन योजना का मकसद

भारत ने 2020 में उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजना (PLI) शुरू की, जिसका लक्ष्य देश में उद्योगों को मजबूती देना और रोजगार बढ़ाना है। यह योजना इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर पैनल, फार्मा और चिकित्सा उपकरण जैसे 14 प्रमुख क्षेत्रों में लागू है। इसके तहत कंपनियों को वित्तीय मदद दी जाती है ताकि घरेलू उत्पाद वैश्विक मानकों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें।

विवाद और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

PLI योजना को लेकर अमेरिका ने भारतीय सोलर पैनल पर भारी ड्यूटी लगाई है और चीन ने WTO में शिकायत दर्ज कराई। उनका कहना है कि भारत के कार्यक्रम विदेशी कंपनियों के लिए नुकसानदेह हैं। लेकिन इसी बीच अमेरिका और चीन खुद अपने उद्योगों को बड़े पैमाने पर सब्सिडी दे रहे हैं, जिससे उनकी दलील विरोधाभासी लगती है।

भारत की रणनीति

भारत ने साफ किया है कि उसकी योजनाएं WTO नियमों के अनुरूप हैं। सरकार का मानना है कि देश के उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में टिकने के लिए यह कदम जरूरी है। उत्पादन बढ़ाने और तकनीकी नवाचार में निवेश करने से भारत आर्थिक तौर पर मजबूत होगा और रोजगार भी बढ़ेंगे।

आर्थिक मजबूरी और लक्ष्य

भारत मैन्युफैक्चरिंग का योगदान जीडीपी में 17% से बढ़ाकर 25% करना चाहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, बिना घरेलू उद्योगों को समर्थन दिए यह लक्ष्य मुश्किल है। PLI और संबंधित नीतियों से भारत की उत्पादन क्षमता में सुधार होगा और वैश्विक निवेश आकर्षित होगा।

इस प्रक्रिया से स्पष्ट है कि भारत की तेजी से बढ़ती आर्थिक शक्ति न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी देखी जा रही है, और इसके असर से अमेरिका और चीन जैसे देश सतर्क हैं।

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