पिछली पेशकशें भी थीं
रूस पहले भी भारत को लंबी दूरी वाले बॉम्बर्स देने का प्रस्ताव रखता रहा है। शीत युद्ध के दौरान, 1990 और 2000 के दशक में Tupolev Tu-22M को भारतीय वायु सेना में शामिल करने की बात उठी थी। 2018-19 में भी Tupolev Tu-160 को लीज पर देने की चर्चा हुई थी, जिसे IAF ने जरूरत से अधिक महंगा और असामान्य बताया था।
Sukhoi क्यों है पर्याप्त?
दरअसल, भारत की मौजूदा सुरक्षा चुनौतियां मुख्य रूप से चीन और पाकिस्तान तक ही सीमित हैं। इन लक्ष्यों को वर्तमान में मौजूद Sukhoi Su-30MKI विमानों और 1,500 किमी दूरी तक मार करने वाली BrahMos-A मिसाइल से आसानी से कवर किया जा सकता है। भविष्य में हाइपरसोनिक हथियारों के आने से यह क्षमता और मजबूत हो जाएगी।
प्रोजेक्ट पर होने वाला भारी खर्च
Tu-160M जैसे बड़े बॉम्बर के लिए भारी निवेश और विशेष इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी। केवल 6-8 विमानों के बेड़े को ऑपरेट करने के लिए सैकड़ों प्रशिक्षित पायलट और तकनीकी स्टाफ की आवश्यकता होगी। साथ ही, इस तरह के बड़े विमान को दुश्मन क्षेत्र में भेजने के लिए लगातार फाइटर स्क्वाड्रन की सुरक्षा भी जरूरी होगी।
पार्ट्स और लॉजिस्टिक्स की चुनौती
Tu-160M में इस्तेमाल होने वाले चार NK-32 इंजन, विशेष रखरखाव और अलग स्पेयर पार्ट्स के लिए नई सप्लाई चेन बनानी पड़ेगी। इससे पहले से मौजूद Su-30MKI और आने वाले Dassault Rafale बेड़े पर किया गया निवेश दोहराना पड़ेगा।

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