निर्यात में मजबूती, लक्ष्य दोहरे अंक की वृद्धि
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने अहमदाबाद में आयोजित ‘चिंतन शिविर’ के दौरान यह जानकारी साझा की कि उद्योग वर्ष 2026-27 तक दोहरे अंक (डबल डिजिट) की वृद्धि हासिल करने की दिशा में काम कर रहा है। इस बैठक में सरकारी अधिकारियों और फार्मा कंपनियों के बीच निर्यात से जुड़े मुद्दों पर गहन चर्चा हुई।
भारत वर्तमान में मात्रा के हिसाब से दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा औषधि उत्पादक देश है। करीब 60 अरब डॉलर मूल्य का यह उद्योग 2030 तक 130 अरब डॉलर तक पहुंचने की क्षमता रखता है। देश से 200 से अधिक देशों में दवाएं निर्यात की जाती हैं, जिनमें से 60 प्रतिशत से अधिक निर्यात सख्त नियामकीय मानकों वाले बाजारों के लिए होता है।
अमेरिका और यूरोप में मजबूत पकड़
भारतीय दवा निर्यात में संयुक्त राज्य अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 34 प्रतिशत और यूरोपीय संघ की करीब 19 प्रतिशत है। यह दर्शाता है कि भारत की दवाएं दुनिया के सबसे कड़े गुणवत्ता मानकों पर खरी उतरती हैं। सरकार का मानना है कि अमेरिका के साथ संभावित द्विपक्षीय व्यापार व्यवस्था भारतीय कंपनियों के लिए बाजार पहुंच और मूल्य प्रतिस्पर्धा को और बेहतर बना सकती है। वहीं, यूरोपियन यूनियन के 572.3 अरब डॉलर के फार्मास्यूटिकल और मेडिकल डिवाइस बाजार में भी भारत के लिए बड़े अवसर मौजूद हैं।
भविष्य की क्या है दिशा?
भारत की ताकत उसकी किफायती उत्पादन क्षमता, मजबूत जेनेरिक दवा उद्योग और उच्च गुणवत्ता मानकों में है। यदि सरकार और उद्योग के बीच समन्वय इसी तरह बना रहा, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल निर्यात के नए रिकॉर्ड बनाएगा, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य क्षेत्र में अपनी भूमिका को और मजबूत करेगा। स्पष्ट है कि भारत का फार्मा सेक्टर सिर्फ आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिहाज से भी अहम भूमिका निभा रहा है। आने वाले समय में यह क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था को नई गति देने के साथ-साथ दुनिया भर में सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करता रहेगा।

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