राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के इस फैसले से उन हजारों भू-स्वामियों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें अब तक अधिग्रहण के कारण अपनी बची हुई जमीन का उपयोग करने या उसका हस्तांतरण कराने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
क्या है सरकार का नया निर्देश?
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव जय सिंह ने सभी जिलाधिकारियों को पत्र जारी कर निर्देश दिया है कि भूमि अधिग्रहण से संबंधित मामलों में केवल उसी हिस्से पर रोक लगाई जाए, जो वास्तव में अधिग्रहण की प्रक्रिया में शामिल है। यदि किसी खेसरा का शेष भाग अधिग्रहण से बाहर है, तो उस पर किसी प्रकार की रोक नहीं लगाई जानी चाहिए।
पहले क्या होती थी समस्या?
केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न विकास योजनाओं, जैसे सड़क, पुल, रेलवे या अन्य सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण किया जाता है। इस प्रक्रिया की शुरुआत में संबंधित जमीन का विवरण निबंधन कार्यालय को भेजा जाता है और अधिग्रहण पूरा होने तक उस भूमि की खरीद-बिक्री रोकने का अनुरोध किया जाता है।
व्यवहार में कई मामलों में यह देखा गया कि यदि किसी खेसरा का केवल छोटा-सा हिस्सा अधिग्रहित होना था, तब भी पूरे खेसरा की खरीद-बिक्री रोक दी जाती थी। इतना ही नहीं, कई बार अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी यह रोक हटाई नहीं जाती थी, जिससे जमीन मालिकों को आर्थिक और कानूनी परेशानियों का सामना करना पड़ता था।
अब जमीन मालिकों को क्या फायदा?
नए निर्देश लागू होने के बाद यदि किसी भूखंड का केवल एक हिस्सा अधिग्रहित होता है, तो उसका बाकी हिस्सा पूरी तरह से भू-स्वामी के अधिकार में रहेगा। वे अपनी आवश्यकता के अनुसार उस जमीन का उपयोग कर सकेंगे, उसकी खरीद-बिक्री कर सकेंगे या अन्य वैध कार्यों में उसका इस्तेमाल कर सकेंगे। इससे न केवल संपत्ति के लेन-देन में आसानी होगी, बल्कि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक उलझनों में भी कमी आने की उम्मीद है।
जिलाधिकारियों को दिए गए स्पष्ट निर्देश
राजस्व विभाग ने सभी जिलाधिकारियों से कहा है कि भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों की समीक्षा करते समय यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रतिबंध केवल अधिग्रहणाधीन रकबे तक सीमित रहे। अधिग्रहण से बाहर की जमीन पर किसी भी प्रकार की रोक नहीं लगाई जाए और यदि कहीं ऐसी स्थिति बनी हुई है तो उसे समय पर दूर किया जाए।
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