मामले में PhD, MA, MSc, LLB और MEd जैसे कोर्स शामिल बताए जा रहे हैं। विभाग की मुख्य चिंता यह है कि अगर कोई शिक्षक नियमित रूप से विश्वविद्यालय की कक्षाओं में शामिल हो रहा है, तो उसी दौरान स्कूल में उसकी उपस्थिति और बच्चों की पढ़ाई कैसे सुनिश्चित हो रही है।
शिक्षा विभाग साफ कर चुका है कि शिक्षकों को अपनी योग्यता बढ़ाने से नहीं रोका जा रहा है। लेकिन नौकरी की जिम्मेदारी प्रभावित किए बिना और तय नियमों के तहत पढ़ाई करना जरूरी है। बिना अनुमति स्कूल से अनुपस्थित रहने या गलत तरीके से हाजिरी दर्ज कराने के आरोप साबित होने पर कार्रवाई हो सकती है।
जांच के दौरान शिक्षकों के नौकरी रिकॉर्ड, विश्वविद्यालय में दाखिले और उपस्थिति से जुड़े दस्तावेजों का मिलान किया जा सकता है। संबंधित शिक्षकों से यह भी पूछा जा सकता है कि उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए विभाग से अनुमति या छुट्टी ली थी या नहीं।
अगर नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो निलंबन, वेतन वृद्धि रोकने और प्रमोशन पर रोक जैसी कार्रवाई की संभावना है। वहीं, नौकरी के साथ पढ़ाई जारी रखने के लिए ओपन और डिस्टेंस मोड को अधिक सुविधाजनक विकल्प माना जाता है।
अब सभी की नजर शिक्षा विभाग की जांच पर टिकी है। करीब 800 शिक्षकों के रिकॉर्ड की पड़ताल के बाद ही साफ होगा कि किन मामलों में नियमों का उल्लंघन हुआ है और किसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
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