दरअसल, बिजली की खरीद और उससे जुड़ी लागत में बदलाव के आधार पर एफपीपीसीए की गणना की जाती है। इसी गणना के चलते उपभोक्ताओं के बिल में पिछले कुछ महीनों में भी कमी देखने को मिली है। जून में जहां उपभोक्ताओं पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त भार पड़ा था, वहीं जुलाई में बिल में करीब 4.43 प्रतिशत की कमी हुई। अगस्त में भी लगभग 2.92 प्रतिशत कम बिल का फायदा मिला।
सितंबर में और बड़ी राहत की उम्मीद
जून की ईंधन लागत में आई कमी का असर अब सितंबर के बिल में दिखाई देने की उम्मीद है। अनुमान है कि सितंबर में बिजली के बिल में 7.50 प्रतिशत से भी अधिक की कमी हो सकती है। इसका लाभ अलग-अलग श्रेणियों के करीब 3.73 करोड़ बिजली उपभोक्ताओं को मिलने की संभावना है। इस संबंध में पावर कॉरपोरेशन की ओर से जल्द आदेश जारी किया जा सकता है। अगर प्रस्तावित कमी लागू होती है, तो घरेलू बिजली उपभोक्ताओं के साथ अन्य श्रेणियों के ग्राहकों को भी इसका सीधा फायदा मिलेगा।
पुराने भुगतान को लेकर हुआ था विवाद
पहले बिजली खरीद से जुड़े पुराने भुगतान को भी ईंधन अधिभार में शामिल किया गया था। इसके कारण उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ बढ़ गया था। विद्युत नियामक आयोग ने इस तरीके पर आपत्ति जताते हुए स्पष्ट किया कि अधिभार की गणना वास्तविक बिजली खरीद लागत और ट्रांसमिशन शुल्क के आधार पर होनी चाहिए।
इसके बाद एफपीपीसीए की गणना में बदलाव आया और उपभोक्ताओं को बिल में कमी का लाभ मिलना शुरू हुआ। अब सितंबर में संभावित कटौती को बिजली ग्राहकों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है। उपभोक्ता परिषद के मुताबिक, एफपीपीसीए की गणना में पारदर्शिता बढ़ने से अब बिजली उपभोक्ताओं को नियमानुसार राहत का लाभ समय पर मिल पा रहा है। सितंबर में होने वाली संभावित कटौती इस साल की सबसे बड़ी राहत में शामिल हो सकती है।

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