यूपी के शिक्षकों की नौकरी पर खतरा? पदोन्नति भी अटकी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में कार्यरत हजारों शिक्षकों के सामने एक गंभीर संकट खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के 1 सितंबर 2025 के आदेश ने प्रदेश के शिक्षा तंत्र को झकझोर दिया है। इस आदेश के बाद राज्य में करीब 1.86 लाख शिक्षकों की नौकरी और पदोन्नति दोनों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। वजह इन शिक्षकों ने अब तक शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण नहीं की है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश और उसका प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह निर्देश दिया है कि जो शिक्षक पांच साल से अधिक सेवा दे चुके हैं, उन्हें आगामी दो वर्षों के भीतर टीईटी पास करना अनिवार्य होगा। यह शर्त अब प्रमोशन प्रक्रिया पर भी लागू होगी। इससे उन शिक्षकों में बेचैनी है जो 2010 से पहले नियुक्त हुए थे और जिनके लिए टीईटी उस समय आवश्यक नहीं था। वर्तमान में उत्तर प्रदेश में कुल 4.59 लाख शिक्षक कार्यरत हैं, जिनमें से लगभग 1.86 लाख शिक्षक इस श्रेणी में आते हैं।

सरकार की पहल और कानूनी लड़ाई

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने का निर्देश दिया। बेसिक शिक्षा विभाग ने इस पर तत्परता से कार्रवाई की है। राज्य सरकार का मत है कि 2010 में शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी से छूट मिलनी चाहिए, क्योंकि उस समय यह अनिवार्यता मौजूद नहीं थी। इस मसले को लेकर विधि विशेषज्ञों से लगातार परामर्श लिया जा रहा है और उम्मीद जताई जा रही है कि केंद्र सरकार इस विषय पर हस्तक्षेप कर शिक्षकों को राहत दे सकती है।

शिक्षक संगठनों का विरोध और असंतोष

राज्यभर में शिक्षकों के बीच टीईटी की अनिवार्यता को लेकर विरोध के स्वर तेज हो गए हैं। कई शिक्षक काली पट्टी बांधकर कक्षाओं में पढ़ा रहे हैं, जिससे उनका विरोध स्पष्ट रूप से सामने आ रहा है। विशिष्ट बीटीसी शिक्षक वेलफेयर एसोसिएशन ने केंद्र सरकार की चुप्पी पर नाराजगी जताई है। एसोसिएशन की वरिष्ठ उपाध्यक्ष शालिनी मिश्रा का कहना है कि 23 अगस्त 2010 की अधिसूचना से पहले नियुक्त शिक्षकों को इस आदेश से बाहर रखा जाना चाहिए था।

इन शिक्षकों के लिए आगे की राह क्या?

विधि सलाहकार का मानना है कि राज्य सरकार ने इस मामले को सही दिशा में उठाया है, लेकिन जब तक केंद्र सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठाती, अंतिम राहत मिलना मुश्किल रहेगा। शिक्षक समुदाय अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार और केंद्र सरकार की पहल की प्रतीक्षा कर रहा है।

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