भारत को लेकर रूस-चीन का संदेश, अमेरिका चौकन्ना!

नई दिल्ली। वैश्विक भू-राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज है। रूस, भारत और चीन के त्रिपक्षीय मंच RIC (Russia–India–China) को लेकर चर्चाएं दोबारा तेज हो गई हैं। रूस ने खुलकर इस मंच को फिर से सक्रिय करने की वकालत की है, जिसे चीन का भी समर्थन मिल रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भारत इस पहल का हिस्सा बनने को तैयार होगा, और अगर ऐसा हुआ तो इसका असर अमेरिका और पश्चिमी देशों पर क्या पड़ेगा।

रूस की पहल, चीन का समर्थन

हाल के बयानों में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत और चीन के साथ रूस के संबंधों को रेखांकित करते हुए RIC संवाद को दोबारा शुरू करने की जरूरत बताई है। यह मंच पहली बार 1998 में प्रस्तावित किया गया था, जिसका उद्देश्य एशिया की तीन बड़ी ताकतों के बीच रणनीतिक संवाद स्थापित करना था। हालांकि, भारत–चीन तनाव के चलते यह मंच कभी पूरी तरह सक्रिय नहीं हो पाया।

भारत की दुविधा: रणनीतिक संतुलन

विशेषज्ञों के अनुसार, भारत RIC को लेकर उत्साह के बजाय सतर्कता दिखा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह चीन के साथ जारी सीमा विवाद और आपसी अविश्वास है। 2020 की गलवान घाटी की घटना के बाद दोनों देशों के रिश्ते अब तक पूरी तरह सामान्य नहीं हो सके हैं। इसके अलावा, भारत यह भी नहीं चाहता कि उसे ऐसे किसी मंच का हिस्सा माना जाए, जिसे अमेरिका और पश्चिम के खिलाफ खड़े समूह के रूप में देखा जाए।

पाकिस्तान फैक्टर और चीन की भूमिका

भारत की चिंता केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान को चीन की सैन्य और रणनीतिक मदद ने भी नई दिल्ली की आशंकाएं बढ़ाई हैं। भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान मानते हैं कि संकट के समय चीन का झुकाव पाकिस्तान की ओर रहा है, जिससे भारत के लिए बीजिंग पर भरोसा करना और कठिन हो गया है।

तीनों देशों की अलग-अलग प्राथमिकताएं

रणनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि RIC को लेकर तीनों देशों की सोच एक जैसी नहीं है। भारत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का समर्थक है और किसी एक धड़े का हिस्सा बनने से बचता रहा है। वहीं, चीन इस मंच को अपने वैश्विक प्रभाव को बढ़ाने के अवसर के रूप में देखता है। रूस के लिए RIC एक ऐसा जरिया हो सकता है, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग पड़ने की छवि से बाहर निकल सके।

आर्थिक और मुद्रा नीति पर भी है मतभेद

RIC के भीतर आर्थिक एजेंडे पर भी एकरूपता नहीं दिखती। डी-डॉलराइजेशन को लेकर भारत और चीन के दृष्टिकोण अलग हैं। जहां चीन युआन को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना चाहता है, वहीं भारत इस दिशा में जल्दबाजी के पक्ष में नहीं है। यह मतभेद RIC के प्रभावी संचालन में बड़ी बाधा बन सकता है।

अमेरिका की नजर, भारत का इंतजार

अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि भारत किसी भी अंतिम फैसले से पहले अमेरिका की भावी नीतियों को ध्यान में रखेगा। खासतौर पर वॉशिंगटन का भारत के प्रति रुख और इंडो-पैसिफिक रणनीति इस निर्णय में अहम भूमिका निभा सकती है। अमेरिका पहले से ही भारत को अपने प्रमुख रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता रहा है।

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