क्यों उठ रही है 5 साल में वेतन संशोधन की मांग?
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि बढ़ती महंगाई, किराया, शिक्षा और स्वास्थ्य खर्चों के कारण 10 साल तक इंतजार करना अब व्यावहारिक नहीं रह गया है। उनका तर्क है कि निजी कंपनियों में हर 3 से 5 साल में वेतन रिवीजन होता है, जबकि सरकारी कर्मचारियों को लंबा इंतजार करना पड़ता है।नेशनल काउंसिल-जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी (NC-JCM) के प्रतिनिधियों ने हाल ही में हुई बैठकों में यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया।
सैलरी को लेकर क्या है कर्मचारियों का तर्क?
कर्मचारी संगठनों के मुताबिक अगर कोई कर्मचारी 2016 में 18 हजार रुपये बेसिक सैलरी पर नौकरी शुरू करता है, तो 10 साल बाद उसकी बेसिक पे करीब 37 हजार रुपये तक पहुंचती है। कर्मचारियों का कहना है कि यह बढ़ोतरी मौजूदा महंगाई के हिसाब से पर्याप्त नहीं मानी जा सकती। उनका मानना है कि अगर हर 5 साल में वेतन संशोधन होगा, तो सरकारी नौकरियां युवाओं के लिए ज्यादा आकर्षक बन सकेंगी।
सरकार के सामने क्या है चुनौती?
जानकारों का मानना है कि हर 5 साल में वेतन आयोग लागू करना सरकार के लिए आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। केंद्र और राज्य सरकारों के बजट का बड़ा हिस्सा पहले से ही वेतन और पेंशन पर खर्च होता है। अगर संशोधन चक्र छोटा किया गया, तो सरकारी खर्च और बढ़ सकता है। इसका असर विकास योजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है।
अब सभी की नजर सरकार पर
फिलहाल केंद्रीय कर्मचारियों की यह मांग राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी बहस का विषय बन चुकी है। कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि 8वां वेतन आयोग 5 साल के वेतन संशोधन मॉडल की सिफारिश करे। अब देखना होगा कि सरकार कर्मचारियों की उम्मीदों और आर्थिक संतुलन के बीच किस तरह फैसला लेती है।
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