इसके बाद अब चर्चा तेज हो गई है कि जिला पंचायत अध्यक्षों और ब्लॉक प्रमुखों का कार्यकाल भी बढ़ाया जा सकता है। इस फैसले के बाद पंचायत व्यवस्था में एक नई स्थिति बन गई है, जहां निर्वाचित प्रतिनिधियों को ही सीमित समय के लिए प्रशासनिक जिम्मेदारी देकर व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने की कोशिश की जा रही है।
ग्राम प्रधान बने प्रशासक, पहली बार लागू हुई नई व्यवस्था
राज्य में ग्राम प्रधानों का पांच साल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अब उन्हें छह महीने या अगली पंचायत बैठक तक प्रशासक की भूमिका दी गई है। इस दौरान वे केवल रूटीन कार्यों का संचालन कर सकेंगे और किसी भी बड़े नीति निर्णय का अधिकार उनके पास नहीं होगा। सरकार ने यह व्यवस्था इसलिए लागू की है ताकि चुनाव में देरी के कारण ग्राम पंचायतों के विकास कार्य प्रभावित न हों।
जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुखों पर भी फैसला संभव
अब सबसे बड़ी चर्चा जिला पंचायत अध्यक्ष और ब्लॉक प्रमुखों के कार्यकाल को लेकर है। मौजूदा व्यवस्था के अनुसार जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल 11 जुलाई को और ब्लॉक प्रमुखों का कार्यकाल 19 जुलाई को समाप्त होना है। पहले इन पदों का कार्यकाल खत्म होने पर प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशासक बनाया जाता था, लेकिन अब उम्मीद की जा रही है कि ग्राम प्रधानों की तरह ही इन पदों का कार्यकाल भी बढ़ाया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो यह पंचायत व्यवस्था में एक और बड़ा बदलाव होगा।
प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव
पहले जहां ग्राम प्रधान के कार्यकाल समाप्त होने पर सहायक विकास अधिकारी (पंचायत) को प्रशासक बनाया जाता था, वहीं अब सरकार ने सीधे ग्राम प्रधानों को ही जिम्मेदारी देने का निर्णय लिया है। इसी तरह जिला पंचायत और ब्लॉक स्तर पर भी यदि कार्यकाल बढ़ाया जाता है, तो यह पंचायत राज व्यवस्था में एक नई परंपरा की शुरुआत मानी जाएगी।
चुनाव में देरी बनी मुख्य वजह
त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में देरी के कारण यह पूरा बदलाव देखने को मिल रहा है। सरकार का मानना है कि जब तक नई पंचायतों का गठन नहीं होता, तब तक विकास कार्यों को रोकना उचित नहीं है। इसी वजह से ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाकर व्यवस्था को जारी रखा गया है और अब जिला स्तर पर भी इसी मॉडल को लागू करने की संभावना जताई जा रही है।

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