यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब दुनिया सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, स्वच्छ ऊर्जा और आधुनिक रक्षा तकनीकों के लिए जरूरी खनिजों की सुरक्षित सप्लाई को लेकर चिंतित है। माना जा रहा है कि इस साझेदारी से दोनों देश चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहे हैं।
क्या है यह रणनीतिक समझौता?
यह समझौता क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ एलिमेंट्स की पूरी सप्लाई चेन को मजबूत करने पर केंद्रित है। इसके तहत खनन, प्रोसेसिंग, रीसाइक्लिंग और निवेश जैसे क्षेत्रों में भारत और अमेरिका मिलकर काम करेंगे। समझौते पर हस्ताक्षर विदेश मंत्री एस. जयशंकर और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मौजूदगी में हुए।
इस डील से क्यों बढ़ी चीन की चिंता?
दुनिया में रेयर अर्थ्स और महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग में चीन का दबदबा माना जाता है। ऐसे में यदि भारत और अमेरिका मिलकर वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार करते हैं, तो वैश्विक बाजार में चीन की पकड़ कमजोर पड़ सकती है। यही वजह है कि इस समझौते को केवल आर्थिक नहीं बल्कि भू-राजनीतिक नजरिए से भी बेहद अहम माना जा रहा है।
तकनीक और रक्षा क्षेत्र को मिलेगा फायदा
इस साझेदारी से दोनों देशों को भविष्य की तकनीकों में बड़ी बढ़त मिल सकती है। सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग, रिन्यूएबल एनर्जी और रक्षा उत्पादन के लिए जरूरी संसाधनों की उपलब्धता अधिक सुरक्षित हो जाएगी। इसके साथ ही यह समझौता सप्लाई चेन में स्थिरता लाने और वैश्विक बाजार में जोखिम कम करने में भी मदद करेगा।

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