भूमि सुधार की शुरुआत और प्रक्रिया
2005 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुआई में एनडीए सरकार ने भूमि सुधार को प्राथमिकता दी। अगले साल, जून 2006 में डी. बंद्योपाध्याय की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय आयोग का गठन किया गया। आयोग की अनुशंसाओं में बंटाइदारों के लिए कुछ सुविधाएं दी गईं, हालांकि पूरी तरह लागू नहीं हो सकीं।
2010 में बिहार राजस्व सेवा का गठन किया गया, ताकि जमीन से जुड़े मामलों को शीघ्र और संगठित तरीके से निपटाया जा सके। इसके साथ ही व्यापक भूमि सुधार योजना पर काम शुरू हुआ और दाखिल-खारिज के लिए अलग नियमावली बनाई गई।
डिजिटलाइजेशन से मिली बड़ी राहत
राज्य में चार करोड़ से अधिक जमाबंदी को डिजिटाइज कर दिया गया है। अब जमीन से जुड़ी हर जानकारी राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के पोर्टल पर उपलब्ध है। इन सेवाओं के लिए अधिकतम समय-सीमा तय की गई है, जिससे काम की पारदर्शिता बढ़ी है और लंबित मामलों की संख्या घटाई जा रही है।
राजस्व महाभियान और जनता दरबार
राजस्व महाभियान के तहत 46 लाख लंबित आवेदनों की पहचान की गई और 31 मार्च 2026 तक निष्पादन का लक्ष्य रखा गया। अब तक 34 लाख से अधिक दस्तावेजों की स्कैनिंग पूरी हो चुकी है। अंचल स्तर पर हर शनिवार को जनता दरबार आयोजित किया जा रहा है। सीएलआर और एडीएम स्तर पर निष्पादन दर 51.7 प्रतिशत से बढ़कर 55.9 प्रतिशत हो गई है।
डिजिटल पहल का असर
डिजिटल प्रक्रियाओं के लागू होने से दाखिल-खारिज निष्पादन दर 75 प्रतिशत से बढ़कर 84 प्रतिशत हो गई है। वहीं लंबित मामलों का प्रतिशत घटकर 25 प्रतिशत से 16 प्रतिशत रह गया है। यह साफ संकेत है कि डिजिटलाइजेशन और समर्पित भूमि सुधार प्रयास बिहार में जमीन से जुड़ी समस्याओं को सरल, पारदर्शी और तेज़ बनाने में सफल साबित हो रहे हैं।
यह बिहार के जमीन मालिकों और किसानों के लिए एक बड़ी खुशखबरी है। अब वे आसानी से अपनी जमीन से जुड़ी जानकारी पा सकते हैं, विवादों का निपटारा जल्दी कर सकते हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ भी सरलता से ले सकते हैं।

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