रूस और अमेरिका की हिस्सेदारी
SIPRI के अनुसार साल 2006 में भारत ने रूस से लगभग 1 बिलियन TIV और अमेरिका से 0.1 बिलियन TIV के हथियार खरीदे थे। 2010–2015 के बीच रूस का हिस्सा बढ़कर 4 बिलियन TIV तक गया, जबकि अमेरिका 1 बिलियन TIV तक ही रहा। फ्रांस का इसमें हिस्सा 2016 से शुरू हुआ और लगातार बढ़ रहा है।
2015–2024 की अवधि में भारत ने सबसे ज्यादा हथियार रूस से खरीदे, लेकिन हिस्सेदारी पहले की तुलना में घटकर 36% रह गई। जबकि फ्रांस ने 28% का हिस्सा हासिल किया, जबकि इजराइल 14% और अमेरिका चौथे नंबर पर रहा। अब फ्रांस की भागीदारी तेजी से बढ़ रही हैं।
फ्रांस क्यों भारत का पसंदीदा बन रहा है?
रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिकी शर्तों ने भारत को वैकल्पिक सप्लायर की ओर बढ़ाया। रूस युद्ध में व्यस्त होने के कारण समय पर सप्लाई देने में असमर्थ था, जबकि अमेरिका ने कई शर्तें रखीं। इसके विपरीत फ्रांस ने बिना शर्त और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ हथियार प्रदान करने का भरोसा दिया। यही कारण है कि भारत की खरीद सिर्फ व्यापारिक नहीं, बल्कि रणनीतिक बदलाव को दर्शाती है।
फ्रांस से अब तक ₹1.97 लाख करोड़ के सौदे
बीते दस साल में भारत ने फ्रांस से कई बड़े सौदे किए हैं:
36 राफेल लड़ाकू विमान: ₹58,891 करोड़
6 स्कॉर्पीन पनडुब्बियां: ₹36,000 करोड़
नेवी के लिए 26 मरीन राफेल और 3 स्कॉर्पीन पनडुब्बियां: ₹99,000 करोड़
राफेल और मिराज विमानों के लिए घातक मिसाइलें और रखरखाव: ₹3,200 करोड़ से अधिक
अब 114 राफेल विमानों की डील होनी वाली है: अब फ्रांस के साथ 114 राफेल विमानों की खरीद पर मुहर लगने वाली है। यह डील लगभग ₹3.25 लाख करोड़ की होगी। अगर इसे पिछले सौदों में जोड़ दिया जाए, तो भारत की फ्रांस से कुल हथियार खरीद 5.22 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो जाएगी।

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