बंगाल की राजनीतिक गाथा: कौन कब रहा सत्ता में, बीजेपी हमेशा पीछे

कोलकाता। पश्चिम बंगाल भारतीय राजनीति के सबसे रोचक और उतार-चढ़ाव वाले राज्यों में से एक है। आजादी के बाद से लेकर आज तक, राज्य ने बड़े सत्ता परिवर्तनों, वैचारिक टकराव और सामाजिक आंदोलनों का प्रत्यक्ष अनुभव किया है। इस राजनीति को तीन बड़े अध्यायों में बांटा जा सकता है। कांग्रेस का प्रारंभिक दौर, वामपंथी शासन का लंबा युग, और तृणमूल कांग्रेस का वर्तमान वर्चस्व।

1. कांग्रेस का बुनियादी दौर (1947–1977)

स्वतंत्रता के बाद बंगाल में कांग्रेस की पकड़ मजबूत रही। डॉ. बिधान चंद्र राय को ‘आधुनिक बंगाल का निर्माता’ कहा जाता है, जिन्होंने 1948 से 1962 तक मुख्यमंत्री के रूप में औद्योगिक और बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया। हालांकि, 1960 के दशक के अंत में खाद्य संकट और आंदोलनों ने राजनीतिक अस्थिरता पैदा की। इस दौरान कई गठबंधन सरकारें बनीं और समय-समय पर राष्ट्रपति शासन भी लागू हुआ।

2.1977–2011: वाम मोर्चे का युग

1977 से 2011 तक पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा (CPI(M)) की सरकार रही। यह भारत का सबसे लंबा स्थायी वाम शासन माना जाता है। इस अवधि में राज्य में नीतिगत स्थिरता और भूमि सुधार जैसी योजनाएँ लागू हुईं, लेकिन समय के साथ सरकार पर भ्रष्टाचार और प्रशासनिक आलोचना के आरोप भी लगे। ज्योति बसु (1977–2000) तक लगातार 23 वर्षों तक मुख्यमंत्री बने और बंगाल में स्थिर शासन का उदाहरण प्रस्तुत किया। वहीं, बुद्धदेव भट्टाचार्य (2000–2011) उन्होंने वामपंथी शासन को जारी रखा।

3 .2011–वर्तमान: तृणमूल कांग्रेस का दबदबा

2011 में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में ऐतिहासिक जीत दर्ज की और वाम मोर्चे का 34 साल का शासन समाप्त किया। इसके बाद से तृणमूल लगातार सत्ता में है। 2016 और 2021 के विधानसभा चुनावों में पार्टी ने भारी बहुमत हासिल कर अपनी पकड़ मजबूत की।

5 .बंगाल बीजेपी की चुनौती और सीमाएँ

बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव और 2019 के चुनावों में बंगाल में कुछ सीटें जीती, लेकिन राज्य स्तर पर कभी भी पूर्ण सत्ता हासिल नहीं कर पाई। कई राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्य की स्थानीय राजनीति, जातीय-सांस्कृतिक मुद्दे और तृणमूल कांग्रेस का मजबूत नेटवर्क बीजेपी के विस्तार में बाधा बनते रहे हैं।

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