‘लंबित’ मामलों की परिभाषा में बदलाव
सरकार ने सबसे बड़ा बदलाव ‘लंबित’ शब्द की परिभाषा में किया है। अब किसी मामले को तभी लंबित माना जाएगा जब सक्षम न्यायालय द्वारा Civil Procedure Code, 1908 के तहत स्थगन आदेश (स्टे) या अस्थायी निषेधाज्ञा जारी की गई हो। इसका अर्थ है कि बिना किसी कानूनी रोक के फाइलों को रोके रखना अब संभव नहीं होगा। ऐसे मामलों में देरी होने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी।
साप्ताहिक समीक्षा होगी अनिवार्य
राजस्व विभाग के प्रधान सचिव सीके अनिल ने सभी प्रमंडलीय आयुक्तों, जिलाधिकारियों और भूमि सुधार उप समाहर्ताओं को निर्देश दिया है कि भूमि मामलों की नियमित साप्ताहिक समीक्षा की जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तय समयसीमा का पालन हो और किसी भी स्तर पर लापरवाही न हो।
अलग-अलग मामलों के लिए तय समय सीमा
राजस्व न्यायालयों में लंबित विभिन्न प्रकार के मामलों के निपटारे के लिए समय-सीमा दोबारा सख्ती से लागू की गई है।
दाखिल-खारिज, अपील, जमाबंदी रद्दीकरण, लगान निर्धारण, बटाइदारी और अतिक्रमण से जुड़े मामले: 30 से 90 दिन
भू-हदबंदी और अन्य प्रशासनिक वाद: निर्धारित अवधि के भीतर
भू-मापी जैसे तकनीकी कार्य: लगभग एक से डेढ़ सप्ताह के अंदर
इस व्यवस्था का उद्देश्य है कि जमीन की नापी या कागजी प्रक्रिया के कारण विवाद लंबे समय तक न खिंचें।
डिजिटल मॉनिटरिंग से होगी निगरानी
राज्य सरकार ने डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से निगरानी को और सख्त कर दिया है। Bihar Bhumi Portal और RCMS पोर्टल पर दर्ज मामलों की प्रगति पर मुख्यालय से नजर रखी जा रही है। उपमुख्यमंत्री सह राजस्व मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने स्पष्ट कहा है कि जमीन से जुड़े मामलों में देरी सीधे आम नागरिक के अधिकारों को प्रभावित करती है। इसलिए अनावश्यक विलंब या उदासीनता बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी।

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