भारत, अमेरिका और चीन साथ-साथ, रूस खुश क्यों?

नई दिल्ली। रूस-यूक्रेन युद्ध के चार वर्ष पूरे होने के मौके पर संयुक्त राष्ट्र में एक अहम कूटनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला। 24 फरवरी को यूक्रेन ने UN में एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें रूस से तत्काल, पूर्ण और बिना शर्त युद्धविराम की मांग की गई थी। प्रस्ताव का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाकर मॉस्को पर दबाव बढ़ाना था, लेकिन मतदान के नतीजों ने वैश्विक राजनीति की जटिलता को उजागर कर दिया।

क्या रहे मतदान के आंकड़े?

193 सदस्य देशों वाली महासभा में 107 देशों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। 12 देशों ने इसका विरोध किया, जबकि 51 देशों ने मतदान से दूरी बनाए रखी। सबसे ज्यादा चर्चा उन देशों को लेकर हुई जिन्होंने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया, इनमें भारत, अमेरिका और चीन जैसे बड़े वैश्विक खिलाड़ी शामिल थे। यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि अमेरिका अब तक यूक्रेन का प्रमुख समर्थक रहा है। ऐसे में उसका मतदान से दूर रहना कूटनीतिक संकेतों से भरा कदम माना गया।

भारत का रुख: संवाद ही समाधान

भारत का रुख शुरू से स्पष्ट रहा है की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान, लेकिन युद्ध का अंत बातचीत से। नई दिल्ली ने न तो रूस के खिलाफ खुलकर मोर्चा लिया है और न ही यूक्रेन का अंध समर्थन किया है। भारत की प्राथमिकता कूटनीतिक समाधान और संतुलित विदेश नीति रही है।

अमेरिका का बदला संकेत ने चौकाया

अमेरिका का मतदान से अलग रहना कई मायनों में चौंकाने वाला रहा। माना जा रहा है कि वॉशिंगटन अब सीधे टकराव की बजाय वार्ता की दिशा में संभावनाएं तलाशना चाहता है। लंबे समय से यूक्रेन को आर्थिक और सैन्य सहायता देने के बाद अमेरिकी नीति-निर्माताओं के भीतर यह बहस तेज हुई है कि आगे की रणनीति क्या हो। यदि अमेरिका बातचीत की राह पर जोर देता है, तो यह रूस के लिए राहत का संकेत हो सकता है, क्योंकि उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव कुछ हद तक कम पड़ सकता है।

चीन की भी रणनीतिक दूरी, संतुलन साधा

चीन ने भी मतदान से दूरी बनाकर संतुलन साधने की कोशिश की। बीजिंग रूस के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को कमजोर नहीं करना चाहता, वहीं वह खुद को वैश्विक शांति के पक्षधर के रूप में भी प्रस्तुत करता रहा है। ऐसे में उसका तटस्थ रुख उसकी दीर्घकालिक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

रूस के लिए क्यों अहम है यह घटनाक्रम?

यद्यपि प्रस्ताव पारित हो गया, लेकिन अमेरिका, भारत और चीन जैसे प्रभावशाली देशों का मतदान से दूर रहना रूस के लिए एक मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक राहत माना जा रहा है। इससे यह संदेश गया कि वैश्विक सहमति पूरी तरह यूक्रेन के पक्ष में एकजुट नहीं है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में केवल प्रस्ताव का पारित होना ही निर्णायक नहीं होता, बल्कि यह भी मायने रखता है कि प्रमुख शक्तियां किस रुख के साथ खड़ी हैं। इस संदर्भ में मॉस्को के लिए यह स्थिति अनुकूल मानी जा रही है।

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