ऑल इंडिया डिफेंस एंप्लॉयीज फेडरेशन (AIDEF) का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में महंगाई की गणना कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की वास्तविक जरूरतों को पूरी तरह नहीं दिखाती है। उनका तर्क है कि रोजमर्रा के खर्च, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतों का असर मौजूदा गणना से ज्यादा दिखाई देता है। कर्मचारी संगठनों के अनुसार, कम आय वाले कर्मचारियों और पेंशनर्स पर महंगाई का दबाव अधिक पड़ता है, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा जरूरी खर्चों में चला जाता है।
अभी कैसे तय होता है DA और DR?
मौजूदा नियमों के तहत केंद्रीय कर्मचारियों का महंगाई भत्ता और पेंशनभोगियों की महंगाई राहत अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (AICPI-IW) के 12 महीने के औसत आंकड़ों के आधार पर संशोधित की जाती है। इसका उद्देश्य महंगाई बढ़ने के कारण कर्मचारियों की खरीद क्षमता में होने वाली कमी को संतुलित करना होता है।
खाने-पीने और जरूरी खर्चों को लेकर चिंता
AIDEF ने अपने ज्ञापन में कहा है कि महंगाई मापने वाले इंडेक्स में कई ऐसे खर्च शामिल हैं, जो हर कर्मचारी और पेंशनभोगी की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाते। खासकर कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए भोजन, दवा, बच्चों की पढ़ाई और घर से जुड़े खर्चों का हिस्सा ज्यादा होता है। ऐसे में उनका मानना है कि DA की गणना में इन जरूरतों को अधिक महत्व मिलना चाहिए।
पेंशनर्स के लिए DR का मुद्दा भी बहुत अहम
पेंशनभोगियों के मामले में फेडरेशन ने स्वास्थ्य से जुड़े खर्चों को प्रमुखता से उठाया है। रिटायरमेंट के बाद दवाइयों, इलाज, मेडिकल इंश्योरेंस और देखभाल जैसे खर्च बढ़ जाते हैं। कर्मचारियों का कहना है कि अगर इन खर्चों में तेजी से बढ़ोतरी होती है तो मौजूदा DR व्यवस्था उनकी आर्थिक सुरक्षा बनाए रखने में पर्याप्त नहीं हो सकती।
8वें वेतन आयोग में क्या हो सकता है असर?
अगर सरकार और वेतन आयोग कर्मचारियों की मांग पर विचार करते हैं तो भविष्य में DA और DR की गणना के तरीके में बदलाव संभव हो सकता है। इससे लाखों केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की सैलरी और पेंशन पर असर पड़ सकता है। हालांकि अभी यह मांग है, अंतिम फैसला 8वें वेतन आयोग की सिफारिशों और सरकार की मंजूरी के बाद ही साफ होगा।

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