आईआईटी दिल्ली देगा तकनीकी सहयोग
इस महत्वाकांक्षी परियोजना में आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञ तकनीकी सहयोग प्रदान करेंगे। संस्थान की विशेषज्ञ टीम गांवों में बायोगैस संयंत्रों की स्थापना, संचालन और रखरखाव से जुड़ी तकनीकी सहायता उपलब्ध कराएगी। साथ ही स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा, ताकि परियोजना लंबे समय तक प्रभावी ढंग से संचालित हो सके।
झांसी का पलींदा बनेगा मॉडल गांव
झांसी के पलींदा गांव को इस योजना के तहत आदर्श मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहां पहले से कई बायोगैस संयंत्र संचालित हैं और लक्ष्य है कि गांव के अधिक से अधिक परिवारों को बायोगैस से जोड़ा जाए। इससे घरेलू ईंधन की उपलब्धता आसान होगी, वहीं जैविक खेती को भी बढ़ावा मिलेगा। सरकार की योजना इस मॉडल को अन्य जिलों के गांवों में भी लागू करने की है।
किसानों को मिलेगा बड़ा फायदा
बायोगैस संयंत्रों से निकलने वाली स्लरी किसानों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद का काम करेगी। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो सकती है और खेती की लागत घटाने में भी मदद मिलेगी। जैविक खाद के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। इससे किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने का अवसर मिलेगा और जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने पर बेहतर आय मिलने की संभावना भी बन सकती है।
आत्मनिर्भर गांव पर जोर
सरकार इस योजना के माध्यम से गांवों में स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाना चाहती है। बायोगैस का उपयोग घरेलू ईंधन के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इससे गोबर और अन्य जैविक अपशिष्ट का बेहतर उपयोग होगा तथा ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता को भी बढ़ावा मिलेगा।
पूरे प्रदेश में होगा विस्तार
सरकार की योजना इस मॉडल को चरणबद्ध तरीके से उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों तक पहुंचाने की है। इसके लागू होने से गो-संरक्षण, जैविक खेती, स्वच्छ ऊर्जा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक साथ मजबूती मिलने की उम्मीद है। यदि यह योजना सफलतापूर्वक लागू होती है, तो प्रदेश के गांव ऊर्जा के क्षेत्र में अधिक आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम बढ़ा सकेंगे.

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