यूपी में महिलाओं के अच्छे दिन! योगी सरकार ने दी 3 बड़ी खुशखबरी

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के गांवों में महिलाओं की आर्थिक स्थिति बदलने लगी है। पशुपालन और डेयरी कारोबार को नए तरीके से बढ़ावा मिलने के बाद बड़ी संख्या में महिलाएं अब दूध के कारोबार की कमान खुद संभाल रही हैं। सरकार के ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर महिलाएं दूध उत्पादन के साथ उसके संग्रह, गुणवत्ता जांच, बिक्री और भुगतान की प्रक्रिया में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

1. दूध बेचकर महिलाएं बढ़ा रहीं अपनी कमाई

प्रदेश के 31 जिलों में महिला समूहों से जुड़ा डेयरी नेटवर्क रोजाना करीब 12.5 लाख लीटर दूध इकट्ठा कर रहा है। गांव की महिलाएं अब सिर्फ पशुओं की देखभाल तक सीमित नहीं हैं। दूध को बाजार तक पहुंचाने और उसकी बिक्री से जुड़े कामों में भी उनकी हिस्सेदारी बढ़ी है। इससे ग्रामीण महिलाओं को अपने घर के पास ही कमाई का साधन मिल रहा है। पशुपालन अब कई परिवारों के लिए अतिरिक्त काम के बजाय नियमित आय का जरिया बनता जा रहा है।

2. बिचौलियों का खेल कम, सही कीमत का हिसाब

डेयरी मॉडल में महिलाओं को सीधे दूध संग्रह केंद्रों और संबंधित संस्थाओं से जोड़ने की कोशिश की गई है। इसका फायदा यह हुआ कि दूध की बिक्री के लिए स्थानीय बिचौलियों पर निर्भरता कम हुई है। संग्रह केंद्रों पर मशीनों के जरिए दूध की मात्रा और गुणवत्ता से जुड़े मानकों की जांच की जाती है। इसके बाद उसी आधार पर कीमत तय होती है। भुगतान और लेनदेन का रिकॉर्ड डिजिटल तरीके से दर्ज होने के कारण हिसाब-किताब में पारदर्शिता भी बढ़ी है।

3. डिजिटल सिस्टम से महिलाओं की बढ़ी पकड़

मोबाइल और डिजिटल तकनीक ने गांव की महिलाओं के लिए डेयरी कारोबार को पहले की तुलना में आसान बनाया है। दूध कब और कितना दिया गया, उसकी गुणवत्ता क्या रही और कितनी राशि बनती है, इन जानकारियों का रिकॉर्ड रखना अब आसान हो गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि दूध की कमाई सीधे महिलाओं तक पहुंचने लगी है। इससे घर के खर्च, बच्चों की पढ़ाई और दूसरी जरूरतों में उनकी आर्थिक भागीदारी मजबूत हो रही है।

73 हजार से ज्यादा महिलाएं बनीं 'लखपति दीदी'

इस मॉडल की सबसे बड़ी उपलब्धियों में महिलाओं की बढ़ती आय शामिल है। उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के अनुसार, डेयरी गतिविधियों से जुड़कर 73 हजार से अधिक महिलाएं 'लखपति दीदी' की श्रेणी में पहुंच चुकी हैं। यानी गांवों में डेयरी अब केवल दूध बेचने का काम नहीं रह गया है। महिला समूहों की भागीदारी, बेहतर बाजार व्यवस्था और डिजिटल तकनीक ने इसे ग्रामीण महिलाओं के लिए कमाई और आत्मनिर्भरता का मजबूत माध्यम बना दिया है।

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