दवाओं की कीमतों पर कैसे लगेगी लगाम?
रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय से जुड़ी जानकारी के मुताबिक, इस व्यवस्था का उद्देश्य कैंसर की गैर-अनुसूचित दवाओं की बिक्री में अत्यधिक मुनाफे पर रोक लगाना है। पहले कुछ दवाओं की खरीद कीमत और अधिकतम खुदरा मूल्य के बीच काफी अंतर होने की शिकायतें सामने आई थीं।
नई व्यवस्था से दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता बढ़ाने और मरीजों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि हर दवा की कीमत 70 प्रतिशत तक घट जाए। वास्तविक कमी संबंधित दवा की मौजूदा कीमत, खरीद मूल्य और लागू नियमों पर निर्भर करेगी।
ब्रांडेड और जेनेरिक दवाएं भी दायरे में
बताई गई व्यवस्था के तहत गैर-अनुसूचित कैंसर दवाओं की विभिन्न श्रेणियों को शामिल करने का लक्ष्य है। इसमें ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के साथ देश में निर्मित तथा आयात की गई दवाएं भी शामिल हो सकती हैं। नियम का उद्देश्य दवा के प्रकार या ब्रांड के आधार पर मरीजों पर पड़ने वाले अनावश्यक मूल्य बोझ को कम करना है।
दवाओं की उपलब्धता बनाए रखने के लिए कंपनियों को उत्पादन जारी रखने से जुड़े निर्देशों का पालन भी करना होगा, ताकि कीमतों पर नियंत्रण के कारण बाजार में आपूर्ति प्रभावित न हो।
पहले भी उठाया जा चुका है ऐसा कदम
कैंसर की दवाओं की कीमतें नियंत्रित करने के लिए सरकार वर्ष 2019 में भी गैर-अनुसूचित एंटी-कैंसर दवाओं के एक समूह पर व्यापारिक मार्जिन की सीमा तय कर चुकी है। उस समय कई ब्रांडों की कीमतों में कमी आई थी और मरीजों को आर्थिक लाभ मिलने की बात सामने आई थी। अब इस नीति का दायरा बढ़ाने का उद्देश्य अधिक दवाओं को इसके लाभ के अंतर्गत लाना है।
मरीजों को क्या फायदा होगा?
यदि निर्धारित मूल्य नियंत्रण प्रभावी रूप से लागू होता है, तो कैंसर का इलाज करा रहे मरीजों को दवाएं खरीदने में राहत मिल सकती है। खासकर उन परिवारों को फायदा होने की संभावना है, जिन्हें लंबे समय तक महंगी दवाओं पर खर्च करना पड़ता है।

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