अमेरिका की हुई बल्ले-बल्ले, ट्रंप टैरिफ से 3 गुना बढ़ी कमाई!

न्यूज डेस्क। अमेरिका की आर्थिक तस्वीर में हाल के महीनों में एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिला है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा कई देशों पर लगाए गए रेसिप्रोकल टैरिफ अब सरकारी खजाने के आंकड़ों में साफ झलकने लगे हैं। आयात शुल्क से होने वाली कमाई में तेज उछाल ने बजट घाटे को कुछ हद तक कम करने में मदद की है।

बजट घाटा हुआ कम

जनवरी के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी बजट घाटा पिछले साल की तुलना में लगभग एक चौथाई घटकर 95 अरब डॉलर रह गया। वहीं वित्त वर्ष 2026 की शुरुआत (अक्टूबर से जनवरी) के चार महीनों में कुल घाटा 697 अरब डॉलर दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि से 17 प्रतिशत कम है। हालांकि यह अभी भी ऐतिहासिक रूप से ऊँचे स्तर पर है, लेकिन गिरावट का रुझान सरकार के लिए राहत की बात है।

टैरिफ का बड़ा कमान 

सरकारी राजस्व में कुल मिलाकर 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 1.8 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। इसमें सबसे तेज वृद्धि आयात शुल्क से हुई कमाई में देखी गई, जो चार महीनों में तीन गुना से ज्यादा बढ़कर 124 अरब डॉलर हो गई। यह दिखाता है कि व्यापार नीति में बदलाव का सीधा असर सरकारी आय पर पड़ा है।

टैक्स से मजबूत आधार

हालांकि टैरिफ चर्चा में है, लेकिन सरकार की आय का सबसे बड़ा हिस्सा अब भी व्यक्तिगत आयकर से आता है। इस अवधि में इनकम टैक्स से 924 अरब डॉलर की वसूली हुई। सोशल सिक्योरिटी और रिटायरमेंट फंड से 579 अरब डॉलर, कॉरपोरेट टैक्स से 112 अरब डॉलर और एक्साइज ड्यूटी से 31 अरब डॉलर प्राप्त हुए। यानी पारंपरिक टैक्स स्रोत अभी भी राजस्व की रीढ़ बने हुए हैं।

खर्च भी कम नहीं

दूसरी ओर, सरकारी खर्च 2.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो पिछले साल से थोड़ा अधिक है। सोशल सिक्योरिटी और मेडिकेयर जैसे सामाजिक कार्यक्रमों पर सबसे ज्यादा खर्च हुआ। ब्याज भुगतान, रक्षा बजट, स्वास्थ्य सेवाएं और आय सहायता योजनाएं भी बड़ी रकम ले गईं। इससे स्पष्ट है कि राजस्व बढ़ने के बावजूद खर्च का दबाव बरकरार है।

आगे की चुनौती

टैरिफ से अमेरिका को तत्काल फायदा जरूर दिख रहा है, लेकिन लंबी अवधि में इसके असर को लेकर सवाल बने हुए हैं। आयात महंगा होने से घरेलू बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं और वैश्विक व्यापारिक रिश्तों पर भी असर पड़ सकता है। फिलहाल इतना तय है कि सख्त व्यापार नीति ने अमेरिकी खजाने को अल्पकालिक मजबूती दी है। अब देखना होगा कि आने वाले महीनों में यह रुझान स्थिर रहता है या आर्थिक समीकरण फिर बदलते हैं।

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