क्या आपका बच्चा बिना मोबाइल के बेचैन हो जाता है? समझिए खतरे की घंटी

नई दिल्ली। आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। ऑनलाइन क्लास, मनोरंजन और दोस्तों से जुड़ाव सब कुछ स्क्रीन के जरिए हो रहा है। लेकिन जब बच्चा मोबाइल न मिलने पर बेचैन, चिड़चिड़ा या आक्रामक हो जाए, तो यह सामान्य आदत नहीं बल्कि एक गंभीर चेतावनी हो सकती है।

क्या है मोबाइल गेमिंग एडिक्शन?

विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी World Health Organization (WHO) ने “गेमिंग डिसऑर्डर” को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या के रूप में मान्यता दी है। इसका अर्थ है कि जब गेम खेलने की आदत बच्चे के व्यवहार, पढ़ाई, सामाजिक संबंधों और मानसिक संतुलन को प्रभावित करने लगे, तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

किन संकेतों पर दें ध्यान?

मोबाइल न मिलने पर गुस्सा या रोना – बच्चा बिना वजह चिड़चिड़ा हो जाता है।

पढ़ाई में गिरावट – पहले अच्छे नंबर लाने वाला बच्चा अब ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहा।

परिवार से दूरी – दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताने की बजाय अकेले गेम खेलना पसंद करना।

नींद में कमी – देर रात तक गेम खेलना और सुबह उठने में परेशानी।

बार-बार गेम की चर्चा – हर बातचीत का विषय केवल गेम्स होना।

अगर इनमें से कई लक्षण लगातार दिखाई दें, तो यह खतरे की घंटी हो सकती है।

क्यों बढ़ रही है समस्या?

आजकल के मोबाइल गेम्स इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि वे बच्चों को लंबे समय तक बांधे रखें। लेवल, रिवार्ड और ऑनलाइन प्रतियोगिता बच्चों में उत्साह के साथ-साथ निर्भरता भी बढ़ा देते हैं। खासकर 8 से 16 वर्ष की उम्र के बच्चे इस प्रभाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं।

अभिभावक क्या करें?

स्क्रीन टाइम तय करें – रोजाना मोबाइल उपयोग की स्पष्ट समय सीमा बनाएं।

वैकल्पिक गतिविधियाँ बढ़ाएं – खेलकूद, किताबें और रचनात्मक गतिविधियों में रुचि जगाएं।

खुलकर बातचीत करें – डांटने की बजाय समझें कि बच्चा गेम्स की ओर क्यों आकर्षित है।

खुद उदाहरण बनें – माता-पिता का संतुलित मोबाइल उपयोग बच्चों पर सकारात्मक असर डालता है।

कब लें विशेषज्ञ की मदद?

यदि बच्चा आक्रामक हो जाए, सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ने लगे या मानसिक तनाव के संकेत दिखें, तो बाल मनोवैज्ञानिक या काउंसलर से सलाह लेना जरूरी है। समय पर हस्तक्षेप से स्थिति सुधारी जा सकती है। मोबाइल तकनीक पूरी तरह से गलत नहीं है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग ही बच्चों के स्वस्थ विकास की कुंजी है। यदि आपका बच्चा बिना मोबाइल के बेचैन हो जाता है, तो इसे जिद या शरारत समझकर टालें नहीं। यह एक संकेत हो सकता है कि अब आपको सजग होने की जरूरत है।

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