उच्चस्तरीय यात्रा और रणनीतिक संकेत
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा ऐसे समय हो रही है जब दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक और हिंद-प्रशांत रणनीति पर सहयोग नई ऊंचाइयों को छू रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ उनकी वार्ता में रक्षा सहयोग की दीर्घकालिक रूपरेखा, सह-विकास और सह-उत्पादन जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे।
राफेल डील से बदला समीकरण
भारत द्वारा Dassault Aviation से राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद ने दोनों देशों के संबंधों को नई मजबूती दी। यह सौदा सिर्फ विमानों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रशिक्षण, रखरखाव, स्पेयर सप्लाई और तकनीकी सहयोग भी शामिल है। विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़ी संख्या में राफेल विमानों का अधिग्रहण फ्रांस को भारत के रक्षा आधुनिकीकरण का केंद्रीय स्तंभ बना सकता है।
‘खरीदार-विक्रेता’ से आगे की बात
भारत और फ्रांस अब केवल रक्षा सौदों तक सीमित नहीं रहना चाहते। ‘हैमर’ मिसाइलों के संयुक्त निर्माण जैसे प्रस्ताव इस बात का संकेत हैं कि सहयोग अब सह-उत्पादन और तकनीकी हस्तांतरण की दिशा में बढ़ रहा है। यह मॉडल भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति के अनुरूप है।
चीन को क्यों हो सकती है चिंता?
हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच चीन क्षेत्रीय संतुलन पर नजर रखे हुए है। भारत-फ्रांस की समुद्री सुरक्षा, इंडो-पैसिफिक रणनीति और उन्नत सैन्य तकनीक में साझेदारी बीजिंग के लिए रणनीतिक संकेत है कि नई धुरी बन रही है। फ्रांस यूरोप की उन गिनी-चुनी शक्तियों में है जिसकी हिंद-प्रशांत में प्रत्यक्ष सामरिक उपस्थिति है। ऐसे में भारत के साथ उसकी साझेदारी क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
क्या सच में फ्रांस बनेगा ‘नया रूस’?
पूरी तरह से किसी एक देश की जगह दूसरा नहीं लेता। रूस अब भी भारत का अहम रक्षा साझेदार है। लेकिन यह स्पष्ट है कि फ्रांस दीर्घकालिक, उच्च तकनीक और भरोसेमंद सहयोगी के रूप में तेजी से उभर रहा है। भारत की रणनीति अब एक देश पर निर्भर रहने के बजाय बहु-स्रोत रक्षा सहयोग की है और इसी रणनीति में फ्रांस की भूमिका लगातार मजबूत होती दिख रही है।

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