अमेरिका का दावा और पृष्ठभूमि
रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते पश्चिमी देशों ने मॉस्को पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। इसी संदर्भ में अमेरिका रूस से तेल खरीद को लेकर साझेदार देशों पर दबाव बना रहा है। मार्को रुबियो ने कहा कि भारत ने अतिरिक्त रूसी तेल नहीं खरीदने का संकेत दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, कुछ भारतीय कंपनियां अप्रैल डिलीवरी के लिए नई खरीद से फिलहाल दूरी बना रही हैं, हालांकि इस पर कोई अंतिम नीति परिवर्तन घोषित नहीं हुआ है।
भारत का क्या है स्पष्ट रुख?
एस जयशंकर ने सम्मेलन के एक सत्र में कहा कि भारत की ऊर्जा नीति उपलब्धता, लागत और जोखिम जैसे व्यावहारिक कारकों से तय होती है। उन्होंने दोहराया कि भारत बाहरी दबाव में निर्णय नहीं लेता, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है। उनके अनुसार, वैश्विक ऊर्जा बाजार जटिल है और तेल कंपनियां वही फैसला करेंगी जो देश और उपभोक्ताओं के हित में होगा।
रणनीतिक स्वायत्तता का संदेश
भारत लंबे समय से “रणनीतिक स्वायत्तता” की नीति पर चलता आया है, जिसका अर्थ है कि वह किसी एक शक्ति-गुट के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ता। जयशंकर ने यह भी संकेत दिया कि भारत ऐसे निर्णय लेने का अधिकार रखता है जो पश्चिमी दृष्टिकोण से भिन्न हो सकते हैं।
ऊर्जा सुरक्षा बनाम भू-राजनीति
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है। ऐसे में सस्ती और स्थिर आपूर्ति उसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। रूस से रियायती दरों पर तेल मिलने से भारत को आर्थिक लाभ हुआ है। वहीं अमेरिका और यूरोप की प्राथमिकता रूस पर दबाव बनाए रखना है। म्यूनिख सम्मेलन में सामने आए बयान यह दर्शाते हैं कि भारत वैश्विक शक्ति संतुलन के बीच अपने हितों को संतुलित तरीके से साधने की कोशिश कर रहा है।

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