अमेरिका-रूस की सीक्रेट डील? चीन को झटका, भारत पर क्या असर?

नई दिल्ली। अमेरिका और रूस के बीच एक संभावित सीक्रेट डील की खबर ने वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक बाजारों में हलचल पैदा कर दी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस समझौते से चीन को बड़ा झटका लग सकता है, जबकि भारत को भी इसकी चुपचाप असर देखने को मिल सकता है।

अमेरिका-रूस डील का मकसद

अमेरिका अपनी मुद्रा डॉलर को और मजबूत बनाने की कोशिश कर रहा है। इसके लिए वह रूस के साथ एक आर्थिक साझेदारी करने की तैयारी में है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बीच हाल ही में बढ़ती दोस्ती इस डील को संभव बना सकती है। अमेरिका की रणनीति में रूस के तेल निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर उसे फायदा मिल सकता है, जबकि रूस को वैश्विक आर्थिक नेटवर्क में वापसी का अवसर मिलेगा।

क्या है संभावित समझौते की चर्चा?

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, रूस दोबारा डॉलर-आधारित सेटलमेंट सिस्टम में वापसी पर विचार कर सकता है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते मॉस्को ने ‘डी-डॉलराइजेशन’ यानी डॉलर पर निर्भरता कम करने की नीति अपनाई थी। रूस ने चीन और भारत के साथ स्थानीय मुद्राओं युआन और रुपये में व्यापार बढ़ाया। अब यदि मॉस्को फिर से अमेरिकी डॉलर में लेनदेन की ओर झुकता है, तो यह वैश्विक वित्तीय समीकरणों में बड़ा बदलाव ला सकता है।

रूस का कदम, चीन के लिए क्यों झटका?

चीन लंबे समय से डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने की रणनीति पर काम कर रहा है। यदि रूस, जो पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण चीन के और करीब आया था, अमेरिका के साथ आर्थिक रिश्ते सुधारता है, तो बीजिंग की रणनीतिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है। रूस की डॉलर प्रणाली में संभावित वापसी, वैश्विक स्तर पर डॉलर की स्थिति को मजबूत कर सकती है जो चीन की महत्वाकांक्षाओं के विपरीत है।

रूस के कदम का भारत पर क्या होगा असर?

भारत की स्थिति अपेक्षाकृत संतुलित है। एक ओर भारत और रूस के बीच दशकों पुराने रक्षा और ऊर्जा संबंध हैं, वहीं अमेरिका के साथ भी भारत की रणनीतिक साझेदारी लगातार गहरी हुई है। यदि रूस-अमेरिका संबंध बेहतर होते हैं और रूसी तेल पर लगे प्रतिबंधों में ढील मिलती है, तो भारत को सस्ती ऊर्जा आपूर्ति जारी रखने में सुविधा हो सकती है। इससे भारत पर अमेरिकी दबाव कम हो सकता है।

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