क्या है ये सरकार की यह स्टडी और क्यों है अहम?
सरकार की यह स्टडी यह समझने के लिए कराई गई कि लेबर कोड के शुरुआती दौर में ज़मीनी स्तर पर उसका असर कैसा रहा। रिपोर्ट के अनुसार, कर्मचारियों के साथ-साथ नियोक्ता भी मानते हैं कि नए नियमों से कामकाजी माहौल अधिक स्पष्ट, डिजिटल और सुरक्षित बन रहा है। खासतौर पर गिग वर्कर्स, कॉन्ट्रैक्ट कर्मियों और महिलाओं के लिए इसे बड़ा सुधार माना जा रहा है।
गिग वर्कर्स तक बढ़ता सोशल सिक्योरिटी कवरेज
स्टडी में यह संकेत मिला है कि सोशल सिक्योरिटी का दायरा अब संगठित क्षेत्र से बाहर निकलकर गिग और कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स तक पहुंचने लगा है। नियोक्ताओं का मानना है कि गैर-मानक कर्मचारियों के लिए योगदान से जुड़ी जिम्मेदारियां अब पहले की तुलना में ज्यादा स्पष्ट हो रही हैं। साथ ही, कागजी औपचारिकताओं और दफ्तरों के चक्कर कम करने पर भी फोकस बढ़ा है।
डिजिटल सिस्टम से सुधर रही भुगतान व्यवस्था
रिपोर्ट के मुताबिक, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के जरिए वेतन और भुगतान प्रणाली में सुधार दिख रहा है। समय पर सैलरी मिलने से न केवल कर्मचारियों में भरोसा बढ़ेगा, बल्कि कार्यस्थल पर अनुशासन और पारदर्शिता भी मजबूत होगी। इससे औद्योगिक विवादों में कमी आने की उम्मीद जताई गई है।
सेफ्टी, वेतन और इनकम सिक्योरिटी पर जोर
कर्मचारियों का विश्वास है कि न्यूनतम वेतन, समय पर भुगतान और अनिवार्य सुरक्षा उपाय कामकाजी हालात को बेहतर बनाएंगे। वहीं, फिक्स्ड-टर्म रोजगार और वर्कफोर्स फ्लेक्सिबिलिटी को रोजगार सृजन के लिए भी उपयोगी माना जा रहा है।
महिलाओं के लिए बेहतर होता कार्यस्थल
लेबर कोड का एक अहम पहलू महिलाओं की सुरक्षा और भागीदारी से जुड़ा है। स्टडी में शामिल कर्मचारियों का मानना है कि अनिवार्य सुरक्षा उपाय, सुरक्षित परिवहन और निगरानी व्यवस्था से महिलाओं के लिए कार्यस्थल पहले से अधिक सुरक्षित बन सकता है। इससे महिला कार्यबल की भागीदारी बढ़ने की संभावना भी जताई गई है।
भरोसा बढ़ा, जागरूकता बढ़ रही
स्टडी के अनुसार, लगभग आधे कर्मचारी लेबर कोड के प्रावधानों से परिचित हैं और बड़ी संख्या को भरोसा है कि समय के साथ उनकी समझ और बेहतर होगी। अधिकांश कर्मचारियों का मानना है कि सही मार्गदर्शन मिलने पर वे नए नियमों का पूरा लाभ उठा सकते हैं।

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