ड्रैगन पर वार की तैयारी! भारत का धांसू प्लान, चीन की बढ़ेगी टेंशन

नई दिल्ली। भारत ने वैश्विक खनिज कूटनीति में एक ऐसा दांव चला है, जिसे रणनीतिक नजरिए से बेहद अहम माना जा रहा है। केंद्रीय खान और कोयला मंत्री ने घोषणा की है कि देश 2026 के अंत तक घरेलू स्तर पर रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) का उत्पादन शुरू कर देगा। यह फैसला केवल औद्योगिक नीति नहीं, बल्कि तकनीकी संप्रभुता की दिशा में बड़ा कदम है।

यह कदम केवल औद्योगिक सुधार नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में भारत की भूमिका को मजबूत करने की दिशा में प्रयास है। यदि लक्ष्य समय पर हासिल होता है, तो भारत न केवल अपनी जरूरतें पूरी कर सकेगा, बल्कि भविष्य में निर्यातक के रूप में भी उभर सकता है। स्पष्ट है कि यह पहल चीन के लंबे समय से चले आ रहे एकाधिकार को चुनौती देने की तैयारी है।

आज के समय में क्यों अहम हैं रेयर अर्थ मैग्नेट?

रेयर अर्थ मैग्नेट आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, विंड टर्बाइन, स्मार्टफोन, मिसाइल गाइडेंस सिस्टम और रडार जैसी अत्याधुनिक तकनीकें इन पर निर्भर हैं। अभी तक इन मैग्नेट के उत्पादन और प्रोसेसिंग पर लगभग 90% नियंत्रण चीन का रहा है। हाल के वर्षों में निर्यात प्रतिबंधों और आपूर्ति शर्तों ने कई देशों को झटका दिया है, जिससे वैकल्पिक स्रोत विकसित करने की होड़ तेज हुई है।

भारत की रणनीति: आत्मनिर्भरता की ओर

सरकार ने इस क्षेत्र में तेजी लाने के लिए ₹7,280 करोड़ की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी है। इसमें ‘सेल्स-लिंक्ड इंसेंटिव’ और पूंजीगत सब्सिडी शामिल हैं, ताकि निजी और सार्वजनिक क्षेत्र मिलकर बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर सकें। लक्ष्य है कि देश हर साल 6,000 मीट्रिक टन मैग्नेट का निर्माण करे।

साथ ही ओडिशा, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात में ‘क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग पार्क’ स्थापित करने की योजना है। बजट 2026 में ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु को जोड़ते हुए ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर’ का प्रस्ताव रखा गया है, जिससे खनन से लेकर तैयार उत्पाद तक की पूरी आपूर्ति श्रृंखला देश के भीतर विकसित हो सके।

संसाधन तो थे, अब तकनीक भी

भारत के पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा रेयर अर्थ भंडार है, करीब 6.9 मिलियन टन। अब तक चुनौती तकनीकी दक्षता और प्रोसेसिंग क्षमता की थी। लेकिन अब खान मंत्रालय और सार्वजनिक उपक्रमों, जैसे NFTDC, ने स्वदेशी तकनीक विकसित कर ली है। सरकार इस तकनीक को निजी उद्योगों के साथ साझा कर बड़े पैमाने पर विनिर्माण को गति दे रही है।

किन क्षेत्रों को होगा फायदा?

घरेलू उत्पादन शुरू होने से इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग की लागत में कमी आ सकती है, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ को बल मिलेगा। रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र में भी आयात पर निर्भरता घटेगी, जिससे संवेदनशील परियोजनाओं में बाहरी जोखिम कम होगा।

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