ऊर्जा और आर्थिक प्रतिबद्धता में बदलाव
ग्रीर ने बताया कि भारत ने रूसी ऊर्जा पर अपनी निर्भरता घटा दी है और अब अमेरिका और अन्य देशों से ऊर्जा उत्पादों की खरीद बढ़ाने की दिशा में कदम उठा रहा है। उनका कहना है कि अगले पाँच वर्षों में भारत अमेरिकी ऊर्जा, विमान और टेक्नोलॉजी उत्पादों में 500 अरब डॉलर तक का निवेश कर सकता है। इससे यह साफ होता है कि भारत वैश्विक व्यापार में एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में उभर रहा है।
सप्लाई चेन में भारत की भूमिका
अमेरिकी कंपनियों के लिए चीन पर निर्भरता कम करने के सवाल पर ग्रीर ने कहा कि भारत सप्लाई चेन का एक भरोसेमंद केंद्र बन सकता है। भारत में अच्छी उत्पादन क्षमता और बड़ी आबादी होने के कारण कंपनियों के लिए यह आकर्षक विकल्प हो सकता है। ग्रीर ने यह भी स्पष्ट किया कि मुख्य उत्पादन अमेरिका में ही बने रहना चाहिए, लेकिन जहां तक अन्य देशों से आपूर्ति की बात है, भारत एक संतुलित और निष्पक्ष विकल्प बन सकता है।
वैश्विक निवेश और भू-राजनीतिक महत्व
यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी कंपनियां सप्लाई चेन में विविधता और जोखिम कम करने पर विचार कर रही हैं। चीन से बाहर निकलकर उत्पादन भारत या अन्य देशों में शिफ्ट करने की संभावना बढ़ रही है। ग्रीर के अनुसार, भारत इस प्रक्रिया में एक प्रमुख पड़ाव और निवेशक केंद्र बन सकता है।

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