विकास और वित्तीय संतुलन की चुनौती
बढ़ते बजट के साथ सरकार के सामने राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने की चुनौती भी बनी हुई है। कोविड के दौरान जब राजकोषीय घाटा 9 प्रतिशत से अधिक पहुंच गया था, तब कई सवाल उठे थे। हालांकि बाद के वर्षों में सरकार ने घाटे को नियंत्रित करते हुए इसे वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 4.4 प्रतिशत तक लाने में सफलता हासिल की है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि बजट 2026-27 में भी सरकार विकास की रफ्तार बनाए रखने के साथ-साथ वित्तीय संतुलन से समझौता नहीं करेगी।
मोदी युग में साल दर साल कैसे बढ़ता गया बजट
2014-15: मोदी सरकार के पहले बजट में कुल खर्च 17.95 लाख करोड़ रुपये रहा।
2015-16: बजट का आकार लगभग स्थिर रहा और यह 17.77 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया।
2016-17: केंद्र सरकार का बजट बढ़कर 19.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा।
2017-18: बजट में और विस्तार हुआ और कुल राशि 21.47 लाख करोड़ रुपये रही।
2018-19: विकास योजनाओं के चलते बजट बढ़कर 24.42 लाख करोड़ रुपये हो गया।
2019-20: सरकार का कुल बजट 27.86 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंचा।
2020-21: कोविड काल में खर्च बढ़ने से बजट 30.42 लाख करोड़ रुपये रहा।
2021-22: आर्थिक संभलाव के बीच बजट का आकार 34.83 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ा।
2022-23: केंद्र सरकार का बजट 39.45 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया।
2023-24: बजट ने 45.03 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार किया।
2024-25: जुलाई में पेश पूर्ण बजट में कुल खर्च 48.21 लाख करोड़ रुपये तय हुआ।
2025-26: केंद्र का बजट रिकॉर्ड बढ़त के साथ 50.65 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया।

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