भद्रा योग का प्रभाव
इस वर्ष महाशिवरात्रि पर भद्रा का योग भी बन रहा है। पंचांग के अनुसार भद्रा की शुरुआत 15 फरवरी की शाम से होगी और 16 फरवरी की सुबह तक इसका प्रभाव रहेगा। हालांकि इस बार भद्रा का वास पाताल लोक में बताया गया है। शास्त्रों में वर्णित है कि जब भद्रा पाताल में स्थित होती है, तब उसका अशुभ प्रभाव पृथ्वी लोक पर नहीं पड़ता। इसलिए श्रद्धालु बिना किसी चिंता के शिव पूजा, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक कर सकते हैं।
रात्रि पूजा का विशेष महत्व
शास्त्रों में महाशिवरात्रि की रात्रि को चार प्रहरों में पूजा करने का विधान बताया गया है।
प्रथम प्रहर: शाम 6:11 बजे से रात 9:22 बजे तक
द्वितीय प्रहर: रात 9:23 बजे से 12:34 बजे तक
तृतीय प्रहर: 16 फरवरी रात 12:35 बजे से सुबह 3:46 बजे तक
चतुर्थ प्रहर: सुबह 3:46 बजे से 6:59 बजे तक
भक्त अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार एक या चारों प्रहरों में पूजन कर सकते हैं।
कैसे करें शिव पूजन?
शिवमहापुराण के अनुसार भगवान शिव की पूजा में बिल्वपत्र का विशेष महत्व है। बिना बिल्वपत्र के शिव पूजा अधूरी मानी जाती है। इसलिए पूजन के समय ताजे और स्वच्छ बिल्वपत्र अवश्य अर्पित करें। इसके अतिरिक्त भक्त शिवलिंग पर जल, दूध या गंगाजल से अभिषेक करें। धतूरा, कमल, शंखपुष्प, कुशपुष्प, मन्दार, तुलसीदल आदि भी श्रद्धा से अर्पित किए जा सकते हैं। पूजा के दौरान धूप-दीप प्रज्वलित करें और सुगंधित प्रसाद अर्पित करें।
महाशिवरात्रि के दिन सफेद चंदन और भस्म का विशेष महत्व माना गया है। शिवलिंग पर भस्म या चंदन से त्रिपुंड बनाकर बाद में स्वयं भी तिलक धारण करना शुभ माना जाता है। रुद्राक्ष को भगवान शिव का प्रिय और पवित्र प्रसाद माना गया है। इस दिन शिवलिंग पर रुद्राक्ष अर्पित कर उसे प्रसाद स्वरूप लाल या सफेद धागे में गले या बाजू में धारण करना शुभ फलदायी माना जाता है।

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