शिव तांडव स्तोत्र का महत्व
महाशिवरात्रि के अवसर पर शिव तांडव स्तोत्र का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस स्तोत्र की रचना लंकापति रावण ने भगवान शिव की आराधना में की थी। जब रावण ने अपने अहंकार को त्यागकर शिव की शरण ली, तब उसने अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में महादेव के तांडव रूप का वर्णन किया।
यह स्तोत्र भगवान शिव की दिव्य शक्ति, उनके रौद्र और करुणामय दोनों स्वरूपों का अद्भुत चित्रण करता है। इसके प्रत्येक श्लोक में शिव के जटाओं में बहती गंगा, मस्तक पर सुशोभित चंद्रमा, कंठ में सर्प और डमरू की ध्वनि का अलौकिक वर्णन मिलता है।
तांडव: सृष्टि और संहार का प्रतीक
शिव का तांडव केवल नृत्य नहीं, बल्कि सृष्टि, स्थिति और संहार का प्रतीक है। यह नृत्य हमें जीवन के परिवर्तनशील स्वरूप का बोध कराता है। जब शिव तांडव करते हैं, तब ब्रह्मांड की ऊर्जा जागृत होती है। शिव तांडव स्तोत्र का नियमित पाठ व्यक्ति के भीतर छिपी नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। यह मन को एकाग्र करता है, भय को समाप्त करता है और आत्मबल को बढ़ाता है।
महाशिवरात्रि पर कैसे करें शिव तांडव स्तोत्र का पाठ?
प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
शिवलिंग का जल, दूध, दही, शहद और बेलपत्र से अभिषेक करें।
दीप और धूप अर्पित कर शांत मन से शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करें।
संभव हो तो रात्रि जागरण करें और "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जप करें।

0 comments:
Post a Comment