यह विकास ऐसे समय में हो रहा है जब हिंद महासागर क्षेत्र में सामरिक प्रतिस्पर्धा तेज है। पाकिस्तान चीन के साथ बड़े रक्षा समझौते के तहत उन्नत पनडुब्बियां हासिल कर रहा है। भारत अब पहली बार तीन परिचालन SSBN (न्यूक्लियर बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां) वाला देश बन जाएगा।
‘सेकंड स्ट्राइक’ क्षमता को मजबूती
रिपोर्ट है की अरिधमन को 2026 में औपचारिक रूप से कमीशन किया जाएगा। फिलहाल यह अपने अंतिम समुद्री परीक्षणों से गुजर रही है। इसके शामिल होने से भारत की ‘कंटीन्यूअस एट-सी डिटरेंस’ रणनीति को बल मिलेगा। यानी साल के 365 दिन कम से कम एक परमाणु पनडुब्बी समुद्र में तैनात रह सकेगी। यह किसी भी संभावित परमाणु हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई की विश्वसनीय क्षमता सुनिश्चित करता है।
क्यों खास है INS अरिधमन?
अरिधमन, पहले से सेवा में मौजूद INS अरिहंत और INS अरिघात से अधिक उन्नत मानी जा रही है।
बड़ा आकार: लगभग 7,000 टन वजनी, जो पूर्ववर्ती 6,000 टन श्रेणी से अधिक है।
मारक क्षमता: यह 3,500 किमी रेंज वाली K-4 बैलिस्टिक मिसाइलों से लैस होगी। साथ ही 750 किमी रेंज की K-15 ‘सागरिका’ मिसाइलें भी ले जा सकेगी।
परमाणु रिएक्टर: 83 मेगावाट का प्रेशराइज्ड वॉटर रिएक्टर इसे लंबी अवधि तक समुद्र में तैनात रहने की क्षमता देता है।
स्टेल्थ टेक्नोलॉजी: विशेष ‘एनेकोइक टाइल्स’ से लैस, जो शोर को कम कर दुश्मन के सोनार से बचाव करती हैं।
स्वदेशी सोनार सिस्टम: ‘उषस’ (USHUS) और ‘पंचेंद्रिय’ जैसे भारतीय विकसित सेंसर इसे बेहतर लक्ष्य पहचान में सक्षम बनाते हैं।
भारत की रणनीतिक छलांग
INS अरिधमन का बेड़े में शामिल होना भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में और मजबूती से स्थापित करता है, जिनके पास समुद्र की गहराइयों से विश्वसनीय परमाणु प्रतिरोध और जवाबी हमला करने की क्षमता है। यह केवल सैन्य शक्ति का विस्तार नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीतिक संतुलन में भारत की बढ़ती भूमिका का भी संकेत है।

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